The Practice Of Soft Eyes


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आंखों की परिधि बढ़ाने की साधना
- पार्कर पामर (१० अगस्त, २०१८)

एक धार्मिक परिदृश्य में, अपनी जटिलताओं और घुमावों के साथ, आश्चर्य एक निरंतर साथी है: यह बस उस मोड़ के आसपास है या अगली घाटी में छिपा है, और यद्यपि यह कभी-कभी हमें हैरान कर देता है, यह अक्सर आनंद लाता है। लेकिन धर्म से वंचित दुनिया की समतल भूमि में, जहां हम अपनी ओर आती चीज़ों के आने से बहुत पहले, चीज़ों को देखने के आदी हो जाते हैं, आश्चर्य की न तो उम्मीद होती है और न ही उसका स्वागत किया जाता है।जब यह मालूम नहीं कहाँ से, अचानक उठता है, हम डर से घिर जाते हैं और शायद क्रूरता से उसका सामना करते हैं । [...]

आश्चयों के प्रति अलग तरीके से प्रतिक्रिया देना संभव है, ताकि हममें एक नया विचार एक दूसरे नए विचार को पैदा कर सके - एक क्रिया जिसे आमतौर पर सोचना कहा जाता है। लेकिन एक चपटी, धर्म से वंचित संस्कृति में जब हम डर या आश्चर्य से ग्रसित हो जाते हैं तो जो होता है वो सोचना नहीं है। इसके बजाय, हम बिना सोचे उस हथियार की तरफ हाथ बढ़ाते हैं जिसका इस्तेमाल करना हम जानते हैं, कोई पुराना विचार जिसका उपयोग करने में हमने बहुत पहले महारत हासिल कर ली थी। [...]

यह अनैच्छिक क्रिया असंख्य समय के क्रमिक विकास में निहित है, इसलिए यह निष्ठुर प्रतीत हो सकती है। फिर भी कुछ शारीरिक सबूत मौजूद हैं कि ऐसा होना ज़रूरी नहीं है।आम तौर पर जब हम अचानक किसी चीज़ का सामना करते हैं, तो हमारी देखने की परिधि का अचानक संकुचन हो जाता है जो कि “लड़ो या भागो” प्रतिक्रिया को बढ़ा देता है - एक गहन, भयभीत, खुद का बचाव करने वाली “पैनी निगाह” में ध्यान केंद्रित हो जाता है जो कि शारीरिक और बौद्धिक मुकाबले के साथ जुड़े हुए हैं। लेकिन जापानी आत्मरक्षा कला,आइकिडो में, इस दृश्य संकुचन का मुकाबला "आंखों की परिधि बढ़ाने की साधना" से किया जाता है, जिसमें हम अपनी देखने की परिधि को चौड़ा करना सीखते हैं, ताकि हम अपने आसपास की दुनिया के अधिक हिस्से को देख पाएं।

यदि आप एक ऐसे व्यक्ति को अचानक उत्तेजना देते हैं जो उसके लिए तैयार नहीं है, तो उसकी आंखें संकीर्ण हो जाती हैं और “लड़ो या भागो” सिंड्रोम शुरू हो जाता है। लेकिन आप अगर एक व्यक्ति को आंखों की परिधि बढ़ाने की साधना
का अभ्यास करना सिखाते हैं, और फिर वही उत्तेजना फिर से देते हैं, तो वो प्रतिक्रिया से परे चला जाता है। वह व्यक्ति उत्तेजना की ओर देखेगा, उसे सोखेगा, और फिर एक और अधिक वास्तविक प्रतिक्रिया देगा - जैसे कि एक नए विचार को सोचना।

आंखों की परिधि बढ़ाने की साधना, मुझे लगता है, जब हम पवित्र वास्तविकता पर टकटकी लगाते हैं उस समय जो होता है उसकी एक विचारोत्तेजक छवि है। अब हमारी आँखें खुली और ग्रहणशील हैं, दुनिया की महानता और बेहतरीन चीज़ों की कृपा को सोखने में सक्षम हैं। आँखें विस्मय से खुली हैं, अब हमें आश्चर्य का सामना करने का प्रतिरोध करने या उससे भागने की ज़रूरत नहीं है। अब हम अपने आप को महान रहस्य के लिए खुला रख सकते हैं।

प्रतिबिंब के लिए बीज प्रश्न: "आंखों की परिधि बढ़ाने की साधना" से आप क्या समझते हैं? क्या आप कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँट सकते हैं जब आपने अपनी परिधि का विस्तार करने से दृष्टि का संकुचन होने का अनुभव किया हो? आपको आंखों की परिधि बढ़ाने की साधना को विकसित करने में क्या मदद करता है?

पार्कर पामर के “शिक्षण का साहस” से।
 

 Parker Palmer from The Courage to Teach.


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