We Are Swimming in Miracles

Author
Peter Kalmus
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Image of the Weekहम चमत्कारों में तैर रहे हैं
- पीटर कालमुस
२९-०३-२०१७

शिकागो। मुझे याद है, मैं हाई-स्कूल में था, मैं चल रहा था। मैं एक मित्र के घर जा रहा था और मैं इन घरों के सामने से गुज़र रहा था; शाम का समय था, हल्का-सा अँधेरा था। हर घर में, एक लय में नीली रोशनी चमक रही थी, क्योंकि हर कोई एक-ही टीवी कार्यक्रम देख रहा था। वो एक शांत रात थी और मैं अकेला सड़क से आती आवाज़ और घरों से आती नीली चमकती रोशनी के साथ चला जा रहा था। और जो मुझे अभी-तक के जीवन में सहज-सामान्य लगता था अचानक बोहोत अजीब लगने लगा था। फिर भी, मैंने जीने का कोई दूसरा तरीका नहीं सोचा। [...]

मुझे लगता है के पश्चिमी संस्कृति में ये एक गलत धारणा है के वस्तुओं की कामना (इच्छा) करना एक समाधान है। वास्तव में, वह दुःख का एक रूप है। मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर ज्यादातर लोग सोचते हों के वस्तुओं की कामना करना और फिर उन कामनाओं की (इच्छाओं की) पूर्ति करना ही सुख है। इसलिए ये लोग लगातार इन कामुक वस्तुओं का पीछा करते रहते हैं, और हो सकता है की एक इच्छा पूरी होने के बाद थोड़े समय के लिए व्यक्ति को इस गहरी पीड़ा से राहत मिले। पर कुछ समय बाद वह पीड़ा फिर से आ जाती है। और इस बार वो और भी शक्तिशाली है, क्योंकि कामना (इच्छा) और उसकी पूर्ति का यह चक्र एक आदात है, और अब ये आदात और गहरी हो गयी है।

इसीलिए, लोगों को इतना-सारा धन मिलने पर भी संतोष नहीं होता। वो स्पोर्ट्स-कारों का एक खफीला खरीद लेंगे एक विशाल हवेली खरीद लेंगे, वह भी पर्याप्त नहीं है। इसलिए एक समर होम खरीदेंगे। फिर एक समर होम फ्रांस में। ऐसे ही चलता रहेगा। फिर वे राजनेताओं और विचारधाराओं को खरीद कर पश्चिमी संस्कृति की पूरी संरचना को बदलने लगते हैं। पर यह भी पर्याप्त नहीं है। इसीलिए अंतरिक्ष पर्यटन आ रहा है। ये लालसा कभी समाप्त नहीं होती। ये अनन्त है।

जो लोग इच्छा और पूर्ति के इस सम्बन्ध को समझते भी है, मुझे नहीं लगता के उनमें से ज्यादातर को ये पता है के इस आदात को बदलने के लिए बोहोत सारा काम करना पड़ेगा। ये पियानों बजाने जैसा है। उन्हें लगता है के वे अचानक से मुक्त हो जाएंगे। है ना ? ज्यादातर लोग ऐसा न मानते हों पर मैं अपने जीवन में काफी लाम्बे समय तक ऐसा मानता रहा, ध्यान का अभ्यास शुरू करने से पहले, के आत्मज्ञान (मोक्ष) एक ऐसी रहस्यमय वस्तु है जो मेरी पहुँच से बहार है, पर किसी प्रकार की कृपा से, किसी रहस्यमय प्रक्रिया, जिसे मैं समझ नहीं सकता, शायद अचानक-से मुझे प्राप्त हो जाए। वास्तव में, मुझे ध्यान और इस आदत से निपटने के बारे में यह पता लगा के इसके लिए बोहोत सारे अभ्यास की जरुरत है, यह एक संगीत-कार्यक्रम पियानोवादक बनने जैसा है। आप इसका प्रतिदिन अभ्यास करते हैं और इस प्रक्रिया में कुछ भी रहस्यमय नहीं है। पर मैं इन सभी 7.2 अरब लोगों इस अभ्यास को शुरू करते नहीं देखता। पर हम सभी को यह अभ्यास करना चाहिए क्योंकि केवल मात्र यही एक मार्ग है जो हमें हमारे दुःख से उबारेगा और सच्चे-सुख का अनुभव कराएगा। शायद ये जल्दी हो सकता है। शायद सौ या शायद हज़ार सालों में हो। मुझे नहीं लगता के कोई अनुमान लगा सकता है। पर अंततः होगा जरूर। [...]

तो जब भी आपको ऐसा विचार आए के आप के पास पर्याप्त नहीं है, आपको अभी किसी वास्तु की जरुरत है, तब आपका मन भविष्य में है। आपको ऐसा लगता है के इस क्षण में कुछ कमी है, यह एक प्रकार की पीड़ा है। पर अगर आप अपने मन में एक छोटा-सा बदलाव करें तो आप देखेंगे के हमारे आस-पास हर चीज़ - इस चाय के प्याले की तरह, और ये हवा जिसे हम सासों में भरते हैं, या सिर्फ ये के हम ये वार्तालाप कर पा रहे हैं, या एक पौधे को बढ़ते हुए देखना, या स्वादिष्ठ फलियां, चार्ड और एवोकाडो का स्वाद जो मैंने अभी-अभी खाए हैं - आप देखते हैं के आप चमत्कारों में तैर रहे हैं। सारी बुरी घटनाए इस सत्य को न पहचान पाने के कारण होती हैं, अपने लिए और पाने की इच्छा के कारण और दूसरों से डरने के कारण, उनसे अलग होने की भावना के कारण और उन्हें विरोधी के रूप में देखने के कारण होती हैं।

ये इच्छा है जो हमें उन चमत्कारों को देखने नहीं देती जिनमें हम तैर रहे हैं। जब हम इन साधारण चमत्कारों को देखते हैं, जीवन इतना - अद्भुत हो जाता है।

चिंतन के लिए बीज-प्रश्न :-

हम चमत्कारों में तैर रहे हैं - इस भाव से आप कैसे जुड़ते हैं ?
क्या आप एक निजी-अनुभव हमारे साथ बाँट सकते हैं जब आपने इन चमत्कारों को पहचाना हो ?
प्रतिदिन के सामान्य जीवन में इन चमत्कारों को पहचानने में आपको क्या मदद करता है ?

यह लेख " works & conversations " में प्रकाशित साक्षात्कार का अंश है। [ लेख के साथ संलग्न चित्र एक अज्ञात मित्र की भेंट है :) ]




 

Peter Kalmus. Excerpt from an interview in works & conversations. [Illustration offered as an anonymous gift :-)]


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