The Glass is Already Broken


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शीशा पहले से ही टूटा हुआ है
-- स्टीवन और आंद्रेया लेवीन द्वारा लिखित (२ नवम्बर, २०१६)

एक बार किसी एक जाने-माने थाई ध्यान मास्टर से पूछा, "इस दुनिया में जहां सब कुछ बदलता है, जहां कुछ भी एक-सा नहीं रहता, जहां हार और दु:ख हमारे अस्तित्व में निहित हैं, तो फिर यहां कोई भी खुशी कैसे हो सकती है? हम सुरक्षा कैसे महसूस कर सकते हैं जब हम देखते हैं कि इस बात का कोई भरोसा नहीं है कि किसी भी चीज़ को जैसा हम चाहते हैं वो वैसी ही रहेगी? शिक्षक ने उस आदमी को सहानुभूतिपूर्वक देखते हुए, एक पीने के गिलास, जो उन्हें उसी सुबह दिया गया था, उसे ऊपर उठाया और कहा, “तुम यह गिलास देख रहे हो? मेरे लिए यह शीशा पहले से ही टूटा हुआ है। मैं इसका मज़ा लेता हूँ। मैं इसमें से पीता हूँ। यह मेरे पानी को बहुत अच्छे से रखता है, कभी-कभी सूरज की किरणों को प्रतिबिबित करते हुए खूबसूरत आकृतियां भी बनाता है। अगर मैं इसे थपथपाता हूँ, तो इसमें से बड़ी अच्छी आवाज़ निकलती है। लेकिन जब मैं इस गिलास को एक शेल्फ पर रख देता हूँ और हवा उसे लुढ़का देती है, या मेरी कोहनी इसे मेज से गिरा देती है और यह टूट जाता है, तो मैं कहता हूँ, “बेशक।” जब मैं समझता हूँ कि यह गिलास पहले से ही टूटा हुआ है, इसके साथ हर पल कीमती है। हर पल बस जैसा है वैसा है, और उसे कुछ और होने की ज़रूरत नहीं है।”

जब हम यह समझ लेते हैं कि, बस इस कांच की तरह, हमारा शरीर भी पहले से ही टूटा हुआ है, कि वास्तव में हम पहले से ही मर चुके हैं, तो जीवन अनमोल हो जाता है, और हम वो जैसा है वैसे ही उसके लिए खुल जाते हैं, उसी क्षण में जिसमे वो हो रहा है। जब हम समझ लेते हैं कि हमारे सभी प्रियजन पहले से ही मर चुके हैं - हमारे बच्चे, हमारे साथी, हमारे दोस्त - तो वो कितने अनमोल बन जाते हैं। कैसे थोड़ा सा डर बीच में टोक लगा सकता है; कैसे थोड़ा सा शक मनमुटाव कर सकता है। जब आप अपने जीवन को ऐसे जीते हैं जैसे आप पहले से ही मर चुके हो, तो जीवन एक नया अर्थ ले लेता है। हर पल एक पूरा जीवन बन जाता है, अपने आप में एक ब्रह्मांड बन जाता है।

जब हम महसूस करते हैं कि हम पहले से ही मर चुके हैं, हमारी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, हमारा दिल खुल जाता है, और हमारा दिमाग पुराने बोझों और बहानों के कोहरे को साफ़ करने लगता है। हम जीवन को गुज़रते देखते हैं, और क्या मायने रखता है यह तुरंत स्पष्ट हो जाता है: प्यार का संचार; समझ के रास्ते में आने वाली बाधाओं छोड़ देना; अपनी पकड़, अपने आप को को खुद से छुपाने का त्याग कर देना। अपना गला खुद घोंटने की बेदर्दी को देखकर, हम सभी प्राणियों के साथ जो प्रकाश बाँट रहे हैं, हम धीरे से उसमें प्रवेश करने लगते हैं। अगर हम हर सीख, हर हानि, हर लाभ, हर भय, हर आनन्द को वैसे लेते हैं जैसे वो उठता है और उसे पूरी तरह से अनुभव करते हैं, तो जीवन जीने लायक हो जाता है। हम अब "जीवन के शिकार” नहीं हैं। और फिर हर अनुभव, यहां तक कि हमारे बन्धुजनों की मृत्यु भी, जागृति के लिए एक और अवसर बन जाती है।

अगर हमारा एक आध्यात्मिक अभ्यास यही हो कि हम पहले से ही मर चुके थे, जिनसे भी हम मिलते हैं उनसे संबंध रखना, हम हर काम ऐसे करते हैं, जैसे कि ये दुनिया में हमारे अंतिम क्षण हैं, तो फिर पुराने खेलों या झूठी बातें या तेवर के लिए हमारे पास क्या समय बचेगा? अगर हम अपने जीवन को ऐसे जीते हैं जैसे कि हम पहले से ही मर चुके हैं, जैसे कि हमारे बच्चे पहले से ही मर चुके हैं, तो आत्म-सुरक्षा और पुरानी मृगतृष्णाओं के पुनः निर्माण के लिए कितना समय बचेगा? केवल प्यार ही उपयुक्त होगा, केवल सत्य।

विचार के लिए कुछ मूल प्रश्न: “जैसे कि हम पहले से ही मर चुके हैं” आप इस तरीके से जीने से क्या समझते हैं? क्या आप कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँट सकते हैं जब आप ऐसा करने में सक्षम हो सके हों? आपको उदासीनता का शिकार हुए बिना चीजों की नश्वरता को देखने में किस चीज़ से मदद मिलती है?

स्टीवन और आंद्रेया लेवीन की किताब, कौन मरता है?: जागरूक जीवन और जागरूक मरण की एक जांच के कुछ अंश।
 

Excerpted from Stephen and Ondrea Levine's book, Who Dies?: An Investigation of Conscious Living and Conscious Dying.


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