Becoming Free of Our Substitute Life

Author
Ezra Bayda
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Image of the Weekअपने प्रतिस्थापित जीवन से मुक्त होना
-- ऐज़रा बेदा (५ अक्टूबर, २०१६)

एक ज़ेन छात्र अपने मास्टर को मिलने के लिए गया। नीचे बैठते हुए, उसके मूँह से निकला, "मुझे कुछ भयानक परेशानी है।” मास्टर ने उसकी ओर देखा और पूछा, "क्या परेशानी है?" एक पल की हिचकिचाहट के बाद छात्र ने जवाब दिया, "मुझे लगता है कि मैं एक कुत्ता हूँ।" तो मास्टर ने जवाब दिया कि, "और तुम कितने समय से ऐसा सोच रहे हो?" छात्र ने कहा, "जब से मैं एक पिल्ला था।"

इस कहानी का आध्यात्मिक अभ्यास से साथ क्या लेना-देना है? सब कुछ। यह बुनियादी मानवीय समस्या को संक्षेप बताती है। अगली बार जब आप खुद को किसी जवर्दस्त भावनात्मक प्रतिक्रिया के नाटक में, गहरे विश्वास किये विचारों में अटके पाओ, तो अपने आप से पूछो कि तुमने इन विचारों को कितने समय से सच्चाई समझ रखा है। विशेष रूप से उन विचारों पर ध्यान दो जिन्हें तुम सबसे ज़्यादा सच समझते हो: "जीवन बहुत कठिन है," "मेरा साथ कोई भी नहीं देगा,” "मैं बेकार हूँ," "मैं निराश हूँ"। तुमने इन विचारों को कितने समय से सच मान रखा है? जब से तुम एक पिल्ले थे!

ये गहरी मान्यताऐं हमारे मन की सतह पर शायद दिखाई नहीं देतीं; हमें अक्सर उनका पता भी नहीं चलता। फिर भी हम इन मन की गहराई में बैठे विश्वासों, इन बुनियादी पहचानों से चिपके रहते हैं, क्योंकि वे हमारी कोशिकाओं - हमारी कोशकीय स्मृति में निहित हो गए हैं। और हमारे जीवन पर उनकी छाप स्पष्ट नज़र आती है। लेकिन इन मान्यताओं और पहचानों की दर्दनाक गुणवत्ता के अनुभव से बचने के लिए, हम लगातार व्यवहार की विभिन्न युक्तियों में जुटे रहते हैं - जूझने के उन आदतन तरीकों से, जो हमें असुरक्षा के उत्सुक कम्पन से बचाते हैं। ये युक्तियां हममें बचाव, सुरक्षा, और अपनेपन की कुछ भावना को स्थापित करने का हमारा प्रयास हैं। उपलब्धियों की मांग, सहायक बनना, अपनी दुनिया को नियंत्रित करने की कोशिश या सुरक्षा की ओर वापस लौटना, इनमें से कुछ हैं। लेकिन क्या वे कभी भी हमें वास्तविक संतुष्टि की भावना देते हैं? नहीं। अक्सर वे हमें हमें असंतोष में फंसा कर रखते हैं, यह बिना जाने कि यहां से कहाँ जाया जाए । मैं इस जगह को “प्रतिस्थापित जीवन” कहता हूँ।

अगर हमारा इतना सौभाग्य है कि हम अपने प्रतिस्थापित या कृत्रिम जीवन से मुक्त होने की तमन्ना कर सकें, तो हम अपने जीने के तरीके के सहित, अपनी सबसे बुनियादी मान्यताओं पर प्रश्न उठाने लगेंगे। हालांकि इस तरह की पूछताछ कष्टप्रद हो सकती है, फ़िरभी यह एक ऐसी चीज़ है जो हमें एक वास्तविक जीवन की ओर ले जाने के लिए समय-समय पर करने की ज़रूरत है। एक प्रश्न ऐसा है जो सीधे बात की सतह तक जाता है: "मेरे जीवन का असल में क्या अर्थ है?" जिस हद तक हम इस सवाल का जवाब ईमानदारी से देते हैं, वही बताएगा कि हम इस बुनियादी मानवीय दुविधा को कितनी स्पष्टता से समझते हैं - कि हम अपने वास्तविक स्वरूप के बारे में जागरूकता से कटे हुए हैं।

[...] अराजकता के डर, चीजें कहीं बिखर न जाएं, ऐसा अनुभव करने के डर से क्या अपने जीवन में नियम और नियंत्रण रखने की कोशिश करते हैं? अस्वीकृति के डर, लोगों में घुल-मिल न पाने के डर से बचने के लिए क्या आप स्वीकृति और अनुमोदन हासिल करने की कोशिश करते हैं? अयोग्य महसूस करने के डर से बचने के लिए क्या आप उत्कृष्टता और सफलता पाने की कोशिश करते हैं? या लालसा और अकेलेपन के गहरे गड्ढों से बचने के लिए क्या आप साहसिक या मनोरंजन के कामों में व्यस्तता ढूंढते हैं? इन सब युक्तियों मे एक चीज़ मिलती-जुलती है: वे हमें हमारे कृत्रिम या प्रतिस्थापित जीवन में जकड़ कर रखती हैं।

हममें से कोई भी इस से परे नहीं हैं। हम सब उन भयों, जो चुप-चाप हमारे जीवन को चला रहे हैं, उनके अनुभव से बचने के लिए कोई न कोई युक्ति का इस्तेमाल करते हैं। फिर भी जब कि हम इन भयों के बारे में सब जानते हैं, फ़िर भी ज्यादातर हम उनके बारे में कुछ भी करना नहीं चाहते। शायद यह निराशावादी और हतोत्साहित करने वाला लगता है, लेकिन ऐसा होना ज़रूरी नहीं है। वास्तव में, हम किस हद तक नींद में हैं - किस हद तक हम अपने प्रयासों के घमंड, अपनी ममताओं के छोटेपन, या अपने भयों से बचने की जल्दी में हैं - इस बात को समझने से हम अपनी निद्रावस्था से, अपने प्रतिस्थापित्त जीवन से जाग सकते हैं।

विचार के लिए कुछ मूल प्रश्न: एक प्रतिस्थापित जीवन से आप क्या समझते हैं? क्या आप कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँट सकते हैं जब आपको अपनी ममताओं की तुच्छता का अहसास हुआ हो? अपने भय से जूझने के समय उससे भागने की किसी युक्ति के प्रलोभन से बचने के लिए आपको किस चीज़ से मदद मिली है?

ऐज़रा बेदा द्वारा लिखित “एक वास्तविक जीवन कैसे जिएं” से उद्धरित।
 

Excerpted from How to Live a Genuine Life by Ezra Bayda.


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