A Bigger Container

Author
Charlotte Joko Beck
26 words, 17K views, 14 comments

Image of the Weekएक बड़ा पात्र
-- शार्लट जोको बैक (२४ जून, २०१५)

हम सुबह से शाम तक “एक्त्व” की बात कर सकते हैं। लेकिन हम अपने आप को औरों से अलग किस प्रकार करते हैं? कैसे? जिस अहंकार से क्रोध का जन्म होता है, वही हमें अलग करता है। और इसका समाधान है एक ऎसी साधना जिसमें हम इस अलगाव की भावना को एक निश्चित शारीरिक अवस्था की तरह अनुभव करें। जब हम ऐसा करते हैं, तो एक बड़े पात्र का निर्माण होता है।

जो बनता है, जो बढ़ता है, वह है जीवन की वो राशि जिससे परेशान हुए बिना, जिसके मुझ पर हावी हुए बिना, मैं जिसे अपने हाथों में पकड़ सकती हूँ। शुरू-शुरू में यह जगह काफी सीमित होती है, लेकिन फिर यह पहले से बड़ी होती है, और फिर और भी बड़ी। उसे कभी बढ़ने से रुकने की ज़रूरत नहीं है। और प्रबुद्ध स्थिति ही वो विशाल और करुणामय स्थान है। लेकिन जब तक हम जीते हैं, हम पाते हैं कि हमारे पात्र के माप की एक सीमा है और यही वह बिंदु है जिस पर हमें साधना करनी ज़रूरी है। और हम यह कैसे जानेंगे कि वो सीमा कहाँ है? हम उस बिंदु पर तब हैं जब हम किसी प्रकार की परेशानी या क्रोध को महसूस करते हैं। यह कोई रहस्य नहीं है। और हमारी साधना की ताकत पर निर्भर करता है कि हमारा पात्र कितना बड़ा हो सकता है।

जब हम यह साधना करते हैं, ये ज़रूरी है कि हम अपने साथ उदारता से बर्ताव करें। जब हम ऐसा करने के लिए तैयार न हों, तो हमें इस बात को पहचानना होगा। कोई भी हर समय तैयार नहीं होता। और जब हम यह न कर सकें तो उसमें कोई बुराई नहीं है। हम हमेशा वही करते हैं जिसके लिए हम तैयार होते हैं।

अपने पात्र को बड़ा बनाने की साधना मूलतः आध्यात्मिक है क्योंकि असल में यह कुछ भी नहीं है। यह बड़ा पात्र कोई वस्तु नहीं है; जागरूकता कोई चीज़ नहीं है; इसका साक्षी कोई चीज़ या व्यक्ति नहीं है। कोई ऐसा नहीं है जो यह देख रहा है। फिर भी जो मेरे मन और शरीर को देख सकता है, वो अवश्य ही मेरे मन और शरीर से अलग होगा। अगर मैं अपने मन और शरीर को क्रोध की अवस्था में देख सकती हूँ, तो वो “मैं” कौन है जो देखता है? इससे मुझे पता चलता है कि मैं अपने क्रोध से अलग हूँ, उससे कहीं विशाल, और यह ज्ञान मुझे बड़ा पात्र बनाने और उसे और बड़ा करने में मदद करता है। तो जिसे बढ़ाने की ज़रूरत है, वो है ध्यान से देखने की क्षमता। हम जो देखते हैं, वो उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम नाराज़ हैं;
महत्वपूर्ण है अपनी नाराज़गी को देख पाने की क्षमता।

जैसे-जैसे पहले देखने की और फिर अनुभव करने की क्षमता बढ़ती है, दो तत्त्व एक साथ बढ़ते हैं: ज्ञान, यह जीवन जैसा है, उसे वैसे ही देख पाने की क्षमता ( न कि जैसा हम चाहते है) और करुणा, ये जीवन जैसा है उसे वैसे ही देख पाने के कारण होने वाली प्राकृतिक क्रिया। अगर किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ होने वाला आमना-सामना गर्व और क्रोध से भरा हो तो हम उनके लिए करुणा का भाव नहीं रख सकते; यह नामुमकिन है। जैसे-जैसे हम एक बड़े पात्र का निर्माण करते है, उसके साथ ही करुणा का भाव बढ़ता है।

विचार के लिए कुछ मूल प्रश्न: एक बड़ा पात्र बनाने से आप क्या समझते हैं? क्या आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बांटना चाहेंगे जब आपने महसूस किया हो कि आपका पात्र बढ़ रहा है? ऐसा क्या है जो आपको अपने पात्र की सीमा के बारे में जागरूक कराता है ताकि आप उसको बड़ा बना सकें?

शार्लट जोको बैक एक अमरीकी ज़ैन गुरु थीं और “एवरीडे ज़ैन: लव एंड वर्क (रोज़मर्रा का ज़ैन: प्यार और काम ) और नथिंग स्पेशल: लिविंग ज़ैन (कुछ खास नहीं: ज़ैन में जीवन) नामक पुस्तकों की लेखिका थीं।
 

Charlotte Joko Beck â€‹was an American Zen teacher and the author of the books Everyday Zen: Love and Work and Nothing Special: Living Zen.


Add Your Reflection

14 Past Reflections