Turning Ourselves Toward Stability And Hospitality


Image of the Weekस्थिरता एवं सत्कारता कि ओर अपने को मोड़ना
द्वारा डेविड मक्की

बेनेडिक्टिन-कैमालडोलिस भिक्षु, ब्रूनो बार्नहार्ट इसे बहुत अच्छी तरह से कहते हैं: "हम मनुष्य एक असहनीय सादगी से प्रबंधनीय जटिलता पसंद करते हैं।"
एक जटिल अस्थिरता मानो हमारी सहज प्रकृति है। हम जहाँ हैं , जैसे हैं और कौन हैं, से बेचैन हैं , और हमें लगता है हमें कहीं और होना चाहिए या हमें किसी और तरह से रहना चाहिए या हमें कुछ और बनना चाहिए। हम अपना और अपनी दुनिया का एक अन्य काल्पनिक स्वप्न संजो लेते हैं और उसके ही पीछे लग जाते हैं और हम जहाँ हैं, जैसे हैं, वास्तविक कौन हैं, पर कोई ध्यान नहीं देते। हम कहीं और पहुंचने में अपना बहुत समय नष्ट कर देते हैं, जबकि जरूरत यह है की हम जहाँ हैं, वहीं पहुंचें , और अपने ह्रदय की सरल , असहनीय ,निराधार गहराईओं में अपने को सकुशल और सुरक्षित महसूस करें।
और साथ में वो जटिल असहजता ( इन्होस्पिटलिटी) है जिससे हम अपने आपको व्यस्त कर लेते हैं। अपने अनुभवों को नियंत्रित करने के प्रयास में हम जटिल दीवारें , दृश्यमान और अदृश्य ढालें, सूक्ष्म अवरोध और मोर्चे खड़े कर लेते हैं, और यह सब इस लिए कि हम निरंतर बदलने वाले , अप्रत्याशित , जीवन प्रवाह से खुद को बचा लें, अपने अंदर और बाहर। बजाय इसके कि हम सहज और सरल भाव से जीवन की निरंतर धाराओं में जो अनअपेक्षित संभावनाएं, जो हमारे मध्य में हर समय हैं, को देखें, हम अपना पूरा समय उस जीवन धारा को अपने नियंत्रण में करने में लगा देते हैं, हम अपना जीवन अपने नियंत्रण, अपने वश में, अपनी उम्मीद के मुताबिक चाहते हैं। जैसे की एक समकालीन ज़ेन शिक्षक ने अद्भुत संक्षिप्तता से कहा है "हम झरने के नीचे छाता खोल के खड़े हो जाते हैं"
इन सब बातों में उलझन यह है की हमें इसके बारे में पता है। हमें पता है की जो जैसा है वह वैसे ही है, अन्य कुछ नहीं है, और हम कैसे चाहते रहते हैं की वो ऐसे बन जाय जैसे की वो नहीं है। हमें पता है की हम जैसे हैं के अलावा कुछ भी दुसरे नहीं हैं। हमें यह भी पता है हमारा जीवन और उसका अनुभव हमारे नियंत्रण से परे है, और शायद ही हम चीज़ों को हम अपनी योजना अनुसार करा पाते हैं और हम लगभग कभी भी बुरी घटनाओं को होने से रोक नहीं पाते। हमारा छाता रिस ही जाता है, चाहे हम कुछ भी करें। हम इस सत्य को भलीभांति जानते हैं , पर क्या करें , भूल जाते हैं। अपनी इच्छाओं , आशंकाओं और अज्ञान में बहते हुए, हम इस साधारण सत्य को भूल जाते हैं, और हम विकास और नियंयत्रं को बढ़ाने के कार्यक्रम में लगे रहते हैं। यह याद दिलाने मैं हमें कौन मदद करता है? चिरस्थायी जवाब यही है की प्रार्थना और अच्छे कर्म, मुझे सरल और बुद्धिमानी वाले कार्य लगते हैं। मुझे ऐसा कोई कारण नहीं लगता की मैं इस सत्य से परे जाऊं, जो की युगों से हमारे ईसाई पूर्वज और सभी धर्मों के पूर्वज दोहराते आये हैं।
अन्य शब्दों में इसका जवाब है, अभ्यास। एक बास्केटबाल खिलाडी की भांति जो गेंद को झोले में डालने का निरंतर अभ्यास करता रहता है, या एक संगीतकार की भांति जो प्रतिदिन सुर मिलाने का अभ्यास करता रहता है, हम भी बार बार, जान बूझकर , ध्यानपूर्वक ये अभ्यास करते रहें, हालाँकि यह हमारे भय और इच्छाओं के विपरीत होगा। इस आशय पर बार बार आते हुए, हम क्रमशः क्रम से, धीरे धीरे, अपने आप को स्वाभाविक रूप से स्थिरता एवं सत्कारता की ओर ले जाते हैं। हाँ , हम अनिवार्य रूप से भूल रुपी निद्रा में खो जाते हैं, पर अंत में हम प्यार भरी जागरूकता के लम्हों में जाग जाते हैं, अपने लिए और औरों के लिये। हमारी विनम्रता (एक अन्य बेनेडिक्टिन मुल्य) इसी मैं है की इस सत्य को अपनाएं और अपनाते रहें, चाहे अधूरेपन से ही क्यों न हो। जब हमारे रेगिस्तानी बुजुर्ग माताओं और पिताओं से पूछा जाता था की आपने रेगिस्तान में दिन भर क्या किया, तो वो कहते थे हम गिरे, फिर उठे, फिर गिरे और फिर उठे, और अंत में, इस गिरने और उठने में, कुछ भी विशेष नहीं है।
मनन के लिए बीज प्रश्न : अपने आप को स्वभाविक रूप से स्थिरता एवं सत्कारता की और ले जाने को हम क्या मानते हैं? क्या आप अपनी कोई व्यग्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं, जब आपने आराम पूर्वक, आपके और आपके पास की निरंतर बह रही धाराओं के अनपेक्षित अवसरों का स्वागत किया हो? क्या चीज़ आपको ध्यानपूर्वक एवं जानबूझकर कार्य करने में मदद करता है?
 

Excerpt from benedictinewomen.org.


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