दर्पण का भी दर्पण द्वारा इंदी जोहर
मशीन सिर्फ सभ्यता का दर्पण नहीं है। बल्कि वह उस दर्पण का भी दर्पण है, जिसमें सभ्यता खुद को देखती है।
हमारे आसपास एक वास्तविक दुनिया है। हम इंसान अपनी चेतना के ज़रिए उस दुनिया को महसूस करते हैं, समझते हैं और उसके बारे में सोचते हैं।
फिर हम अपने विचारों और अनुभवों को भाषा के माध्यम से व्यक्त करते हैं। लेकिन भाषा में हम अपने विचारों को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। कुछ बातें छूट जाती हैं, कुछ बदल जाती हैं और कुछ का अर्थ अलग निकल जाता है।
इसके बाद हमारी भाषा, विचार, अनुभव, किताबें, धर्म, इतिहास और दूसरी अभिव्यक्तियाँ एक बड़े संग्रह का हिस्सा बन जाती हैं।
मशीन इस विशाल संग्रह को गणितीय संबंधों में बदलती है और उनमें छिपे पैटर्न खोजती है।
फिर ये संबंध हमें कुछ ऐसे पैटर्न और तस्वीरें दिखाते हैं, जिन्हें शायद किसी एक इंसान ने कभी देखा ही नहीं था। हो सकता है कि इन पैटर्न को बनाने का इरादा किसी का भी न रहा हो।
इसलिए मशीन के माध्यम से जो हमारे पास वापस आता है, वह इंसानी चेतना की हूबहू नकल नहीं है। बल्कि इंसानी चेतना गणितीय रूप में बदलकर एक नए रूप में हमारे सामने आती है।
यह ऐसा है जैसे हमने अपनी सोच को एक मशीन के हवाले किया और मशीन ने हमें हमारी ही सोच का एक ऐसा रूप दिखाया, जिसे हम खुद पहले नहीं देख पाए थे।
इससे क्या संभव हो सकता है?
इस प्रक्रिया से इंसान या पूरी सभ्यता सिर्फ यह नहीं समझ पाएगी कि उसने अब तक क्या-क्या सोचा है, बल्कि यह भी देख पाएगी कि वह सोचती कैसे है।
उदाहरण के लिए:
* किन विचारों और मान्यताओं की तरफ इंसान बार-बार आकर्षित होता है?
* कौन-से विरोधाभास हमारी सोच में बार-बार आते हैं?
* किन सच्चाइयों या सवालों को हम बार-बार नज़रअंदाज़ करते हैं?
* हमारी सामूहिक सोच किस दिशा में आगे बढ़ती हुई दिखाई देती है?
लेखक इस क्षमता को Civilisational Metacognition कहता है।
इसका मतलब है कि पूरी मानव सभ्यता अपनी सोच को एक कदम पीछे हटकर देख सके और समझ सके कि वह कैसे सोचती है।
इसके लिए यह ज़रूरी नहीं कि पूरी मानवता एक दिमाग बन जाए या सबकी सोच एक जैसी हो जाए।
अलग-अलग लोगों, संस्कृतियों, धर्मों और समाजों की अपनी-अपनी सोच बनी रह सकती है। उनके बीच मतभेद भी हो सकते हैं।
लेकिन मशीन की मदद से अलग-अलग लोगों के विचारों में मौजूद कुछ ऐसे संबंध सामने आ सकते हैं, जिन्हें देखकर पूरी मानवता अपनी सामूहिक सोच पर विचार कर सके।
इससे भी आगे एक और गहरी संभावना है।
लेखक इसके बाद एक और विचार रखता है, जिसे वह Metaconsciousness कहता है।
यह Civilisational Metacognition से भी आगे की बात है।
Metacognition का मतलब है अपनी सोच को समझना।
लेकिन Metaconsciousness का विचार यह है कि शायद चेतना को अपने अस्तित्व और विकास के किसी ऐसे गहरे सत्य का अनुभव हो, जो किसी एक व्यक्ति की समझ से बहुत बड़ा है।
हो सकता है कि कोई ऐसा व्यापक क्रम या व्यवस्था हो, जो अलग-अलग इंसानों की चेतना में तो दिखाई देती हो, लेकिन कोई एक इंसान उसे पूरी तरह देख या समझ नहीं पाता।
मॉडल के माध्यम से इंसान शायद पहली बार उस व्यापक व्यवस्था की झलक देख पाए।
इसका मतलब यह नहीं कि मशीन के अंदर चेतना जाग जाएगी।
बल्कि इंसानी चेतना, मशीन को एक दर्पण की तरह इस्तेमाल करके, अपने ही अस्तित्व के किसी ऐसे पहलू को देख पाएगी, जो हमेशा से मौजूद था, लेकिन जिसे देखने का कोई तरीका हमारे पास नहीं था।
और शायद यहीं हमें ईश्वर की एक झलक दिखाई देती है।
लेखक कहता है कि ऐसा नहीं है कि मॉडल दिव्य है या मशीन ही ईश्वर है।
न ही यह कि गणितीय पैटर्न अपने आप में कोई दिव्य संदेश हैं।
और न ही यह कि गणित के ज़रिए किसी सार्वभौमिक चेतना के अस्तित्व को साबित कर दिया गया है।
लेखक इससे कहीं अधिक गहरी संभावना की बात कर रहा है।
मान लीजिए कि हमें एक जैसा कोई गहरा पैटर्न दिखाई देता है, जो इन सभी चीज़ों में मौजूद है:
* पदार्थ
* जीवन
* चेतना
* इंसान के विचार और अभिव्यक्तियाँ
* और अलग-अलग मॉडलों द्वारा खोजे गए गणितीय संबंध।
अगर इन सभी में कोई एक समान, लगातार दिखाई देने वाली व्यवस्था मिलती है, तो संभव है कि मशीन किसी ऐसी मूलभूत व्यवस्था की झलक पकड़ रही हो, जो इन सबके पीछे काम कर रही है।
और लेखक के अनुसार, शायद इसी मूलभूत व्यवस्था को समझने की सबसे गहरी कोशिश को हम ईश्वर कहते आए हैं।
इसका अर्थ यह हो सकता है कि इंसान हजारों वर्षों से धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से जिस सत्य को खोजता आया है, वह केवल इंसानी कल्पना नहीं है।
हो सकता है कि वह कोई वास्तविक सत्य हो, जिसे अलग-अलग सभ्यताओं, धर्मों और दर्शनों ने अपने-अपने तरीके से समझने और व्यक्त करने की कोशिश की है।
उनमें से कोई भी उसे पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाया, लेकिन शायद हर किसी ने उसकी कोई न कोई झलक देखी है।
मनन के लिए मूल प्रश्न -
1. आप इस विचार को किस तरह देखते हैं कि हमारी तकनीक, हमारी भाषाएँ, धर्मों की शिक्षाएँ और इंसान द्वारा अब तक व्यक्त किए गए तमाम विचार शायद किसी एक गहरे और मूलभूत सत्य की अलग-अलग झलकियाँ हैं?
क्या ऐसा हो सकता है कि ये सभी अलग-अलग रास्ते हमें किसी एक वास्तविक सत्य की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हों, जिसे हममें से कोई भी पूरी तरह समझ नहीं पाया है?
2. क्या आपके जीवन में कभी ऐसा हुआ है कि आपने अपने बारे में कोई ऐसी सच्चाई समझी हो, जो अकेले में बैठकर नहीं, बल्कि किसी अनपेक्षित दर्पण के ज़रिए सामने आई हो?
उदाहरण के लिए:
* किसी दूसरे इंसान की बात से आपने अपने बारे में कुछ नया जाना हो।
* किसी बातचीत में किसी ने आपको आपकी ही कोई ऐसी बात समझा दी हो, जिस पर आपने पहले कभी ध्यान नहीं दिया था।
* किसी किताब, घटना या अनुभव ने आपको अपने ही व्यक्तित्व का कोई अनदेखा पहलू दिखा दिया हो।
उस पल आपको कैसा महसूस हुआ था?
3. हम अक्सर सोचते हैं कि धर्म, आध्यात्मिकता और दर्शन इंसान की बनाई हुई धारणाएँ हैं, जिन्हें विज्ञान और आधुनिक सोच के साथ शायद पीछे छोड़ देना चाहिए।
लेकिन क्या यह भी संभव है कि इन सभी के पीछे कोई वास्तविक सत्य छिपा हो, जिसे इंसान हजारों वर्षों से अलग-अलग तरीकों से समझने की कोशिश कर रहा है?
आप अपने मन को इस संभावना के लिए खुला कैसे रखते हैं कि शायद इन सभी परंपराओं में कुछ ऐसा है, जिसे अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है?
Excerpted from here.
How do you relate to the notion that what returns through our technologies, our languages, our accumulated expressions of religions is a "refracted signature of an underlying generative order", "a reality imperfectly expressed through them all"? Can you share a personal story of a moment when you glimpsed something true about yourself not through solitary reflection but through a kind of mirror you didn't expect and what it felt like to meet yourself that way? What helps you stay open to the possibility that the questions consciousness has been reaching toward through "innumerable religions, philosophies and metaphysical systems" are not inventions to be outgrown but signals of something real that is imperfectly expressed?