मेरे स्वप्न, मेरे कर्म —तब तक प्रतीक्षा करें,
जब तक मैं अपने अंधेरों से होकर लौट न आऊँ।
⁃ ग्वेंडोलिन ब्रूक्स के द्वारा
मैं अपने शहद को सँभालकर रखती हूँ,
और अपनी रोटी को भी —
अपनी इच्छा की छोटी-छोटी अलमारियों में।
हर डिब्बे पर नाम लिखती हूँ,
हर ढक्कन से कहती हूँ —
“मजबूत रहना,
जब तक मैं अपने अँधेरों से लौट न आऊँ।”
मैं बहुत भूखी हूँ,
अभी अधूरी हूँ।
और कोई नहीं जानता
कि फिर कब तृप्ति मिलेगी।
हर कोई बस इतना कहता है —
“थोड़ा इंतज़ार करो।”
एक छोटी-सी रोशनी है,
जिस पर मैं अपनी नज़र टिकाए रखती हूँ;
आशा करती हूँ —
जब मेरे दुख के दिन
धीरे-धीरे थककर मिट जाएँ,
और मैं लौटूँ
जितनी शक्ति शेष है,
उतनी हिम्मत लेकर,
तो मुझे घर लौटने का रास्ता याद रहे।
और जब मैं लौटूँ,
तो मेरी रुचि अब भी
उस मिठास और उस सादगी को पहचान सके,
जिन्हें कभी मेरे भीतर की पवित्रता ने प्रेम किया था।
मनन के लिए मूल प्रश्न
1. जब जीवन कठिन हो, तब भीतर से आने वाले उस नरम-से इशारे—“अच्छाई के प्रति सुन्न मत हो”—को आप कैसे सुनते और निभाते हैं?
2. क्या आप कोई ऐसा अनुभव साझा कर सकते हैं, जब बाहर बहुत हलचल थी, तब आपने अपने भीतर की शांति को कैसे बनाए रखा?
3. आपके लिए ऐसे कौन से सहारे या अभ्यास हैं , जो आपको जीवन की सादगी और मिठास से जोड़ कर रखते हैं ?
Gwendolyn Brooks was the first African American to receive a Pulitzer Prize. Her work often dealt with the personal celebrations and struggles of ordinary people in her community.
Seed Questions for Reflection
What do you make of the nudge to protect ourselves from insensitivity to goodness when in the midst of difficult times? Can you share a personal story of a time you kept your eyes pointed in while in the midst of great travails outside? What helps you protect your taste from becoming numb to goodness?