महिमा और उसका आतंक
- इरीना ट्वीडी के द्वारा
यह अहसास कि हमारा हर कर्म, हर शब्द, हर विचार, न केवल हमारे पर्यावरण को प्रभावित करता है, बल्कि रहस्यमय तरीके से ब्रह्मांड का एक अभिन्न अंग बन जाता है, इसमें इतनी अनुकूलता से बैठता है जैसे कि उसी का हिस्सा हो, उसी क्षण में, जब हम ऐसा करते हैं या कहते हैं या सोचते हैं। यह एक भारी, और यहां तक कि दिल दहला देने वाला अनुभव है।
काश हम, गहराई से, पूरी तरह से जानते, कि हमारा सबसे छोटा कर्म, हमारा सबसे छोटा विचार, ऐसे दूरगामी प्रभाव पैदा करने में सक्षम है - शक्तियों को गतिशील करता है; आकाशगंगा तक पहुँचता है - तब हम कितनी सावधानी से काम करेंगे और बोलेंगे और सोचेंगे। इसकी अभिन्नता में जीवन कितना अनमोल बन जाएगा !
यह अद्भुत और भयावह है। जिम्मेदारी की इतनी गहराई और पूर्णता, भयानक और आकर्षक है, जिसमें अद्वितीय होने की तीव्र असुरक्षा और अनन्त अविभाजित पूर्ण का भाग होने की गहन सांत्वना है। और हम सभी को जीवन के इस अद्भुत अर्थ की प्राप्ति, और प्राप्त करने का अधिकार है; हम सब सरल रूप से इस सब का हिस्सा है; संपूर्णता की एकल दृष्टि।
मेरे शिक्षक के निधन के बाद यह बहुत तीव्र हो गया। और मैं गर्मी की पीड़ा, उन्मत्त कुत्तों, गंदे बच्चों, पसीने, बदबू को समेट नहीं सका; क्योंकि वे भी इसी का हिस्सा थे ...
लेकिन यह यहाँ, पहाड़ों की शांति में, धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया; जागृत चेतना में एक अलग आयाम से खुद को आसुत। और अब मुझे महिमा और उसके आतंक के साथ रहना चाहिए ... यह निर्दयता है, अपरिहार्य है; एक गहन रूप से साहसी, नशीली उपस्थिति, इतनी हर्षित, असीम और मुक्त। इसे शब्दों में ढालने का प्रयास करना निन्दा है।
मुझे पता है कि जैसे जैसे मैं वास्तविकता के करीब आता जायूँगा, नज़दीकी बढ़ जाएगी, अधिक स्थायी हो जाएगी; लेकिन यह भी कि अलगाव की स्थिति और अधिक दर्दनाक, और अधिक अकेली हो जाएगी ।
मनन के लिए मूल प्रश्न: आप इस धारणा से कैसे सम्बद्ध हैं कि 'हम सब सरल रूप से इस सब का हिस्सा है'? क्या आप उस समय की एक व्यक्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं जिसे आपने नशीली उपस्थिति का अनुभव किया है, पूरी तरह से हर्षित, असीम और स्वतंत्र? आपको अपने छोटे से छोटे कार्यों के लिए भी अद्भुत और भयावह जिम्मेदारी स्वीकार करने में क्या मदद करता है?
Irina Tweedie was a Russian-British Sufi and teacher in the Sufi tradition. Excerpt above from her book,
Chasm of Fire.
Seed Questions for Reflection
How do you relate to the notion that 'one is quite simply part of it all'? Can you share a personal story of a time you experienced the intoxicating Presence, utterly joyous, boundless and free? What helps you accept the wonderful and frightening responsibility for even the smallest of your actions?