वो आधार जिस पर आप सब खड़े हैं
-जिद्दु कृष्णमूर्थी (२९ अगस्त, २०१८)
श्रीमान, क्या आपको अहसास है कि आप संसार हैं और संसार आप है? ये संसार आपसे और मुझसे अलग नहींहै।रिश्तों का एक साँझा धागा है जो हम सब को एक साथ बाँधे हुए है। कहीं गहराई में हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । गहराई से हम सब पूरी तरह से जुड़े हुए हैं। सतही चीजें अलग दिखाई देती हैं। अलग प्रजातियां, अलग-अलग दौड़, अलग संस्कृतियां और रंग, अलग-अलग राष्ट्रीयताएं और धर्म और राजनीति।
यदि आप बारीकी से देखते हैं, तो आप तुरंत देखेंगे कि हम जीवन के चित्रपट का हिस्सा हैं।जब हम खुद को संबंधों के इस शानदार नमूने के हिस्से के रूप में देखते हैं तो राष्ट्रों, धर्मों और राजनीतिक प्रणालियों के बीच संघर्ष समाप्त हो सकता है। संघर्ष अज्ञानता से पैदा होते हैं।जब हम इस तथ्य से अनजान होते हैं कि सभी जीवन एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, तो हम एक दूसरे को नियंत्रित करनेकी कोशिश करते हैं। जब इस बात की कोई समझ नहीं होती कि संबंध हमारे अस्तित्व का आधार हैं, तो समाज में केवल विघटन होता है। सम्बंध वह आधार है जिस पर हम सभी खड़े हैं।
[मैंने पूछा, "आप कहते हैं कि धर्म, राजनीति और विचारधाराओं ने मानवता को घायल कर दिया है। हम इन घावों को कैसे ठीक कर सकते हैं? हम कैसे संबंधित स्थिति में वापस आ सकते हैं?"]।
समस्या धर्म या राजनीति से कहीं अधिक गहरी हो जाती है। यह हमारे दिमाग में, हमारी आदतों में, हमारे
जीवन में शुरू होती है। एक निरंतर कंडीशनिंग है जो सदियों से चल रही है। हम कंडीशनिंग के अधीन हैं और हम अपनी कंडीशनिंग में भाग लेते हैं। न्याय, पूर्वाग्रह, पसंद और नापसंद, वे सभी एक ही समस्या का हिस्सा हैं। हमें यह विश्वास करने के लिए कंडीशन किया गया है कि देखनेवाला देखी जा रही चीज़ से अलग है, विचारक विचार से अलग है। यह दोहरावाद, यह विभागीकरण, सभी झगड़ों, संघर्षों और संघर्षों की जड़ है । क्या तुम मुझे समझ रहे हो, महोदय? यह बहुत महत्वपूर्ण है।
["मुझे उम्मीद है कि मैं समझ सकता हूँ ।लेकिन, हम दोहरेवाद से पूर्णता तक कैसे जाते हैं?" मैंने फिर पूछा ।]
चीज़ों को ठीक होने के लिए, हमें सिद्धांतों, सूत्रों और तैयार किए गए उत्तरों से परे जाना होगा। हमें चुप रहना होगा और ध्यान देना होगा। मौन और चिंतन ध्यान करने के लिए आधार प्रदान करते हैं। ध्यान विखंडन के घावों को ठीक करने की प्रक्रिया है। ध्यान में, विभाजन समाप्त होता है और पूर्णता उभरती है। तब 'मैं' और 'आप', 'अच्छा' और 'बुरा' के बीच कोई विभाजन नहीं रह जाता।
जब कोई अहंकार नहीं होता, कोई व्यर्थता नहीं, कोई डर नहीं, कोई अलगाव नहीं, कोई असुरक्षा नहीं, कोई अज्ञान नहीं होता फिर रोग़हरण और पूर्णता होती है।
मनन के लिए बीज प्रश्न:
हम अपनी कंडिशनिंग में कैसे भाग लेते है, इस बात तक पहुँचने के लिए आप अपनी धर्म या राजनीति को ज्यादा गहराई से जाने की आवश्यकता से क्या समझते हैं?
क्या आप कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँट सकते हैं जब आप अपने स्वयं के पूर्वाग्रह से परे जाने में सक्षम हो पाए हों भले ही यह कितना अच्छा महसूस क्यों ना हुआ हो और सम्बंध बना पाए हों ?
विभाजन से परे देखने और पूर्णता पर पहुंचने में आपको क्या मदद करता है?
जे कृष्णमूर्ति एक महान भारतीय दार्शनिक और ऋषि थे। उपरोक्त उद्धरण सतीश कुमार के साथ उनके संवादों में से है, जो कि 'तुम हो, तो मैं हूँ ‘ ('You Are, Therefore I Am.' ) में संग्रहीत किया गया है।
यह लेख मूलतः अंग्रेजी में लिखा गया था जिसका हिंदी अनुवाद रेखा गर्ग द्वारा Awakin (Service Space) के लिए किया गया है।
J. Krishnamuti was a great Indian philosopher and sage. The excerpt above is from his dialogues with Satish Kumar, as archived in '
You Are, Therefore I Am.'
Seed Questions for Reflection
How do you relate to the need to go much deeper than religion or politics to arrive at how we participate in our own conditioning? Can you share a personal story of a time you were able to go beyond your own prejudice, no matter how noble it felt, and be in relationship? What helps you see beyond division and arrive at wholeness?