कैसे निरीक्षण संबंधों को बदलता है
- विमला ठाकर (१९ दिसंबर, २०१८)
जब हम चुप्पी में बैठते हैं तो हम क्या करते हैं? हम बैठते हैं और शरीर और दिमाग की स्वैच्छिक और अनैच्छिक गतिविधियों का निरीक्षण करते हैं। धीरे धीरे स्वैच्छिक गतिविधियों का अंत हो जाता है, लेकिन अनैच्छिक गतिविधियां हमें जन्म से विरासत में मिली हैं, हमारे परिवार, धर्म, नस्ल, राष्ट्रीयता से - जो हमारे दिमाग में भरी हैं - वो चलती रहती हैं - और हम बैठकर उनका अनावरण होते देखते हैं।
चूंकि हमें हर समय काम करने की आदत है, शुरू में हमें चुप होकर बैठना मुश्किल लगेगा, या जमा हुई थकान की वजह से शरीर शायद सो जाए। अगर ऐसा होता है तो बेहतर होगा कि शरीर को कुछ आराम दिया जाए जब तक वो फिर से तरो-ताज़ा नहीं हो जाता। जब आप चुप होकर बैठते हैं, तो विचार उठेंगे, क्योंकि मन चौबीस घंटों काम करता रहा है। विचारों को दबाया नहीं जा सकता और न ही उन्हें कहीं दूर फेंका जा सकता है, आप केवल उन्हें देख सकते हैं, उन्हें बिना कोई बुरा या भला नाम दिए। तो फिर आप एक भोक्ता और एक कर्त्ता की भूमिका से मुक्त हो जाते हैं, आप बिना प्रतिक्रिया के ध्यान के निरीक्षक होने की अवस्था में प्रवेश कर लेते हैं।
जैसे ही मन चलना शुरू कर देता है और कहता है: जो वो देखता है ये "मुझे पसंद है" या "मैं नापसंद है" तो एक अशांति आ जाती है, मन में एक हलचल होती है, और निरीक्षक होने की भूमिका खत्म हो जाती है और आप एक बार फिर एक अनुभव करने वाले और कर्ता की भूमिका में डूब जाते हैं। जिन विचारों का आप निरीक्षण कर रहे हैं, यदि आप उनपर प्रतिक्रिया नहीं दिखाते, अगर उनमें आप में से प्रतिक्रिया निकालने की अब शक्ति नहीं है, तो वो अपने आप ही ख़त्म हो जाएंगे।
निरीक्षण के इस दृष्टिकोण का विस्तार हमें संबंधों पर भी लगाना होगा। जब एक बार निरीक्षक की स्थित जागृत हो जाती तो वो संबंधों को बदल देती है। यह एक अद्भुत शक्ति है जो जागृत हो जाती है। जब निरीक्षण पूरे दिन एक लगातार स्थिति बन जाता है, तो:
(1) कोई आत्म-धोखा नहीं है। हम अपने आप से कुछ भी नहीं छुपाते हैं। अवचेतन या बेहोशी के रूप में कुछ भी नहीं बचता है क्योंकि सब कुछ निरीक्षण से उभर रहा है। अब केवल एक जागरूक स्तर है।
(2) हम दूसरों को धोखा देना या अपनी कोई दूसरी छवि दिखाना बंद कर देते हैं। बिना किसी औचित्य या निंदा के, जो है, उसे देखना, उस छवि को तोड़ देता है। अब हममें जीने और जो हम हैं, वो होने का साहस आ जाता है।
(3) जो हमारे अंदर हो रहा है हम उसके बारे में जागरूक हो जाते हैं, विभिन्न भावनाओं के बारे में जो हमारे अंदर उठ रहीं होती हैं, उदाहरण के लिए, अगर हमें गुस्सा आने लगता है तो हम उसके बारे में जागरूक हो जाते हैं और गुस्से के हम पर जो पकड़ होती है वो ढीली हो जाती है।
(4) हम अपनी गलतियों को पहचानते हैं और स्वीकार करते हैं; तत्काल क्षमा मांगते हैं, इस प्रकार अपने मन को अवशेष के बोझ से मुक्त करते हैं।
(5) निरीक्षण के माध्यम से विचार मिट जाते हैं, इसलिए जो तनाव और दबाव वे तंत्रिका और रासायनिक तंत्र पर डालते हैं, वो भी उठ जाते हैं। यह तनाव ही है जो समाज-विरोधी व्यवहार लाता है।
(6) दुःख और सुख वर्तमान क्षण से आगे नहीं ले जाए जाते; इस प्रकार कोई द्वेष या राग नहीं बनते। जीने की कला है पूर्ण रूप से इस पल में जीना, किसी अवशेष को अगली घटना, अगले व्यक्ति और दिन तक न ले जाकर।
प्रतिबिंब के लिए मूल प्रश्न: आप अगले अनुभव में पुराना बचा कुचा अनुभव न ले जाने की धारणा से क्या समझते हैं? क्या आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँट सकते है जब आपके निरीक्षण ने आपका सम्बन्ध बदल दिया हो? आप इस पल में उपस्थित रहते हुए निरीक्षण करने का अभ्यास कैसे करते हैं?
विमला थकर द्वारा
Seed Questions for Reflection
How do you relate to the notion of not carrying any residue over into the next experience? Can you share a personal story of a time your commitment to observation changed your relationship? How do you practice observation while staying checked in?