Meditate Like Christ

Author
Krishna Das
22 words, 38K views, 85 comments

Image of the Week जीसस मसीह की तरह ध्यान करो

एक दिन एक कनाडा निवासी नीम करोली बाबा (महाराज जी) को पहली बार मिलने आया. उसने महाराज जी के बारे में सुन रखा था पर उसे उनके बारे में ज्यादा पता नहीं था. महाराज जी व्याख्यान या औपचारिक शिक्षा नहीं देते थे; न ही किताबें लिखते थे; और जहां तक मुझे मालूम है, औपचारिक रूप से लोगों को दीक्षा भी नहीं देते थे. वो तो बस सूरज की तरह चमकते रहते थे. फूल को धूप में कैसे खिलना है, यह जानने के लिए उसे कोई मैनुअल पढ़ने की जरूरत नहीं है. तो जब महाराज जी ने उस व्यक्ति से पूछा कि वह उनके पास क्यों आया है और वह क्या चाहता है, तो उसे समझ नहीं आया कि वह क्या कहे. अंत में उसने जवाब दिया, 'क्या आप मुझे ध्यान करना सिखा सकते हैं?"

महाराज जी का जवाब था: 'मसीह की तरह ध्यान करो. जाओ अन्य पश्चिमी देशों के लोगों के साथ मंदिर में सबसे पीछे बैठ जाओ.'

वह व्यक्ति पीछे आया तो हमने उससे पूछा उसका महाराज जी के साथ दर्शन कैसा रहा. उसने कहा कि महाराज जी ने उसे मसीह की तरह ध्यान करने के लिए कहा है. पहले तो हम बहुत हैरान हुए. 'क्या, मसीह की तरह ध्यान ! इसका क्या मतलब है?' लेकिन फिर हमने इस बारे में सोचा. हम हमेशा इस कोशिश में लगे रहते थे कि महाराज जी हमें साधना करने का कोई तरीका सिखा दें, लेकिन वो कभी हमें किसी खास किस्म के योग या ध्यान का तरीका नहीं बताते थे. अब उन्होंने ऐसा कह दिया, अगर उन्होंने कहा है कि जीसस की तरह ध्यान करो तो उनको ज़रूर मालूम होगा कि जीसस कैसे ध्यान करते थे. हमने सोचा कि उनसे इस बारे में पूछा जाए. हम बहुत उत्साहित थे - आखिर हमें कोई गुप्त शिक्षा मिलने वाली थी!

उस दिन जब बाद में महाराज जी मंदिर में पीछे हमसे बात-चीत करने आए, तो हममें से एक ने उनके सामने उस विषय को रखा जो हम सब को उत्साहित कर रहा था. 'आपने कहा कि मसीह की तरह ध्यान करो, पर वे कैसे ध्यान करते थे? '

ऐसा लगा कि महाराज जी उस प्रश्न का जवाब देने ही वाले थे, लेकिन उसके बजाय उन्होंने अपनी आंखें मूँद लीं और वो एकदम खामोश और स्थिर होकर बैठ गए. ऐसा लग रहा था जैसे वो वहां मौजूद ही न हों. मैं जितने समय से उनके साथ था, उतने समय में मैंने उन्हें इस अवस्था में बैठे एक-दो बार ही देखा था. उस क्षण में असाधारण शक्ति थी, जैसे कि पूरा संसार शांत हो गया हो. फिर उनकी आँख से एक आंसू टपक पड़ा. हम हैरानी से देख रहे थे. कुछ समय के बाद उनकी आँखें कुछ खुलीं और उन्होंने महान भावना के साथ हौले से कहा, 'उन्होंने खुद को प्यार में खो दिया , वो ऐसे तप करते थे. वो खुद में और दूसरे प्राणियों में एकत्व महसूस करते थे. वो सबको प्यार करते थे, उनको भी जिन्होंने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया। वो कभी मरे नहीं. वो तो आत्मन (आत्मा) हैं. वो हम सब के ह्रदय में रहते हैं. उन्होंने प्यार में खुद को खो दिया.'

एक बार फिर, महाराज जी बात की तह तक पहुँच गए. मैं दंग रह गया. मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहता था कि मैं भी प्यार में खुद को खो सकूँ लेकिन इससे अधिक मुश्किल काम कोई नहीं लग रहा था. जैसा कि कबीर ने कहा है, "आग की गर्मी सहन करना आसान है और इसी तरह तलवार की धार पर चलना संभव है. लेकिन एक कभी न बदलने वाले प्यार को बनाए रखना सबसे कठिन काम है.

- जीवन के मन्त्र (चैंट्स ऑफ़ लाइफटाइम) में कृष्ण दास

विचार के लिए कुछ मूल प्रश्न: ईसा मसीह की तरह ध्यान करने से आप क्या समझते हैं? हम एक कभी न बदलने वाले प्यार को कैसे बनाए रख सकते हैं? क्या आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बांटना चाहेंगे जब आपने खुद को प्यार में खो दिया हो या किसी और का अनुभव जिसने आपको छू लिया हो जिसमें उसने खुद को प्यार में खो दिया हो.?


Add Your Reflection

85 Past Reflections