Lessons From An Accident

Author
Grace Dammann
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Image of the Weekदुर्घटना से मिली सीख
-ग्रेस डैमन (२२ जुलाई, २०१३)

पिछले चालीस सालों से मुझे दूसरों का ख्याल रखने का एक जुनून रहा है. फिर मेडिकल स्कूल में मुझे इस शौक को पूरा करने का भरपूर मौका मिल गया, और पिछले पच्चीस सालों से मैंने बहुत खुशी से डॉक्टरी का काम किया है. लेकिन पिछले एक साल से मैं देखभाल करने और देखभाल करवाने वालों के इस विभाजन के दूसरी ओर पहुँच गया हूँ. ग्यारह महीनों से मैं हर काम करने के लिए दूसरों पर निर्भर हूँ: दांत ब्रश करने के लिए, खाना खाने के लिए, कुर्सी से उठने-बैठने के लिए. मैं शुरू में समझता था कि दया भाव को प्यार और सहानुभूति के साथ इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन अब मैं सोचता हूँ कि दया भाव को समझदारी के साथ जोड़ना चाहिए।

"कम्पैशन" शब्द लैटिन भाषा के मूल शब्द "पैटी" से निकला है, जिसका मतलब है - "कष्ट भोगना". तो "कम्पैशन" (सहानुभूति) का अर्थ है दर्द और कष्ट के साथ पूरी तरह से मौजूद रह पाना. जब मैं कहता हूँ कि "कम्पैशन" को समझदारी के साथ जोड़ना चाहिए, तो मेरा क्या मतलब है? मेरा कहने का मतलब यह है कि मेरी सबसे अच्छी सेवा तब होती है जब और लोग जो मेरा ख्याल रख रहे हैं, वे अपने खुद के काम करने के उच्चतम तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं, ना कि केवल मेरे रोने- धोने पर मेरी मांगें पूरी कर रहे है. मैंने सीखा कि सबसे महान सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार वो है जो कि मुझ में सही ढंग से दिमागी उदासी और दूसरों पर निर्भरता को हटाने में बढ़ावा देता है. और दूसरी ओर सबसे कम सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार वो है, जो मुझे अपनी आदतों का ग़ुलाम बनाता है, मुझे दूसरों पर निर्भर रहने का बढ़ावा देता है.

जब मैं दो महीने की बेहोशी के बाद जागा, तो बस मेरा एक लक्ष्य था - अब यही करना है.

बिस्तर पर लेटे हुए मुझे यह अहसास हुआ कि मुझे अपने खुद के तरीके को बदलना होगा। मुझे मालूम था कि एक ऐसा तरीका था जो मैंने नहीं अपनाया था, जैसे सुई के छेद में से धागे को पिरोने के लिए पूरी एकाग्रता की ज़रुरत होती है. मेरे पास अपने दिमाग में चल रहे विचारों पर ध्यान देने का अब बहुत समय था और बहुत से विचार पछतावे की वजह से नहीं बल्कि इस बात से निकल कर आ रहे थे कि मैंने ज़िन्दगी को पूरी तरह नहीं जिया। और जब किसी चीज़ पर अपना पूरा मन लगाया तो मुझे सम्पूर्ण सुख का अनुभव हुआ. मैंने यह भी पाया जो लोग मुझे प्रिय हैं, वो इस बात से खुश हैं कि उन्हें हर समय अब मेरी पीठ नहीं देखनी पड़ती - उन्हें मेरा ध्यान पाने के लिए मेरे मोबाइल फ़ोन और पेजर से होड़ नहीं लगानी पड़ती। पहली बार मैं दूसरों में ज़िम्मेदारी को प्रोत्साहन दे रहा था, मेरे पास अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचने, सूर्य की किरणों का आनंद लेने और लोगों को वो जैसे हैं वैसे अपनाने, और सिर्फ जीने के अलावा कोई काम ना था.

दुर्घटना में मेरे सिर पर चोट आयी, और हैरानी की बात है, कि पिछली यादों में मेरी दिलचस्पी ख़त्म हो गयी, भगवन का शुक्र है. जिसे डॉक्टर शायद ध्यान न दे पाना या बात को ठीक से न समझ पाने की बीमारी कहते, उस अवस्था ने वास्तव में मुझे इस पल में पूरी तरह जीने का मौका दिया. उदाहरण के लिए, दर्द आता-जाता रहा, उबकाई आती-जाती रही, कब्ज़ आती-जाती रही, लेकिन पता नहीं किसी खास कारण से इन में से किसी भी चीज़ में मेरा ध्यान ज्यादा देर नहीं लगा, मैंने बहुत-सा समय शावर का आनंद लेने में लगाया, जिस तरह पानी की बौछार मेरे सिर पर महसूस होती, या किसी के नाख़ूनों का स्पर्ष जब वो मेरे सिर पर शैम्पू लगा रहे होते। मैं भविष्य के बारे में सोचने पर बहुत कम समय लगाता, मैं क्या करूंगा, ये मुझे क्या हो गया जिसने मुझे इतना छोटा बना दिया. इसकी बजाय, मेरा पूरा ध्यान सिर्फ वर्तमान के माहौल पर था. जागने पर मैंने देखा कि मैं पूरी तरह से पकड़ में था और जैसे खुद धरती तथा मेरे अद्भुत परिवार और समुदाय के सहारे ने जैसे मुझे प्यार के बंधन में बांध रखा हो.

मुझे अब अहसास होता है कि मेरी ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा खुशी के पल वो थे जब मैं औरों की सेवा में रत था, खास तौर पर वो हर्ष जो तब आता है जब कोई अपने और दूसरे के दुःख में पूरी तरह मौजूद हो. सेवा करने में अब मेरा नया जोर खुद को हमेशा यह याद कराने में है, "अभी करो, बस अभी करो, और संवेदनशील बनो." अगर आप जानना चाहते हैं कि आप कैसा काम कर रहे हैं, तो बस अपने आस-पास के लोगों से पूछें। वो आप को बहुत खुशी से बताएंगे. आप का काम है उनकी बात को सुनना और उसे अपनाना। उसे अपने मन में जगह दें। आप औरों पर क्या असर डालते हैं, इस बात को समझने की कोशिश करें। अगर आप जानना चाहते हैं कि आप अपनी नौकरी में कैसा काम कर रहे हैं, बस अपने सहकर्मियों से पूछ लें. अंत में, अगर आप जानना चाहते हैं कि आप दुनिया में कैसा काम कर रहे हैं, तो बस पेड़ों और हवा से पूछें, और सूर्य पर ध्यान दें.

-ग्रेस डैमन

कुछ मूल प्रश्न: आप कम्पैशन (सहानुभूति) को समझदारी से जोड़ने के बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँटना चाहेंगे जब आपको सेवा में ऐसा लगा हो कि " अभी करो" और आगे के लिए मत छोड़ दो? ये जानने के लिए कि आप कैसा काम कर रहे हैं, पेड़ों और हवा से पूछना और सूर्य की ओर ध्यान देना- इस बात से आप क्या समझते है?


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