We Are What We Choose to Be

Author
Dawna Markova
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हम वो हैं जो हम बनना चाहते हैं
-- डॉना मार्कोवा ( १४ अक्टूबर, २०१५)

बहुत असाधारण और खास क्षणों में, किसी ने मुझे उस समय के बारे में बताया जब वो सैक्सोफोन बजाया करता था या जब वह पीड़ित महिलाओं के लिए एक आश्रयघर खोलने का सपना देखती थी या जब वो सोचता था कि वो गरीब बच्चों का संरक्षक बन सकता था या जब वो सोचती थी कि उसने अपना बचपन किन मुसीबतों से गुज़ारा, उसके बारे में वो एक किताब लिखने वाली थी। और उनके चेहरे खिल उठते हैं। तब जो होता है उसका वर्णन करने का कोई दूसरा तरीका नहीं है। उनके गालों में लाली आ जाती है, उनके शरीरों में जोश आ जाता है, जब वो बोलते हैं उनकी आवाज़ों में बिजली कौंध उठती है। एक क्षण के लिए, घड़ी की सुइयाँ थम जाती हैं। फिर वे रुक जाते है, अपने आप को ऐसे झकझोरते हैं जैसे कोई कुत्ता गर्म दिन में ठंडी झील में तैरने के बाद थरथराता है, और फिर वे वापिस अपने आप में खो जाते हैं, पैसे, समय और उन्होंने वो सब क्यों नहीं किया, इसके बारे में बात करते है। "ठीक है, (...) मैं तो बस ऐसा इंसान नहीं हूँ जो वैसा कर पाता...उस तरह मैं अपने जैसा महसूस नहीं करता।” जैसे वो घड़ी फिर चलने लगती है, मैं उन दिलों की विफलताओं को देखती हूँ।

मेरे बेटे ने एक बार मुझसे कहा कि वो बड़ा होकर आदमी नहीं बना चाहता क्योंकि वो सब ऐसे लगते हैं जैसे वो मुर्दे की तरह चल-फिर रहे हों। मैं मृतवास्था से वापस निकल आई और यह समझ पाई कि हम जीवित रहने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। अभी। इस पल में। अपने आप को परिभाषित करने के लिए स्वतंत्र। हम वो हैं जो हम बनना चाहते हैं। मेरा अर्थ यह नहीं है कि कुछ भी पाने के लिए स्वतंत्र। मेरा अर्थ है कुछ बनने के लिए स्वतन्त्र। मुझे मालूम है कि हममे से बहुत लोगों के पास पर्याप्त पोषण, जगह और शिक्षा नहीं है। लेकिन मुझे ये बात भी याद है कि जब नेल्सन मंडेला को नाव में बंदी बनाकर ले जाया जा रहा था तो वो कैसे ज़ोर-ज़ोर से आज़ादी के गीत गए रहे थे। और मुझे वो जमैकी फ़रिश्ता याद है जो एक हस्पताल की ज़मीन पर झाड़ू लगता था और जिसने रात के अँधेरे में मेरे कान में वो शब्द फूँक दिए जिन्होंने मेरे लिए सब कुछ बदल दिया: “तुम अपने भय से कहीं अधिक हो।” मैं जानती हूँ हममें से कुछ और हैं जिनके पास जितना वो खा सकते हैं, उससे कहीं अधिक खाना है, ज़रूरत से कहीं अधिक बड़े घर, जितनी वो इस्तेमाल कर सकते हैं, उससे कहीं अधिक शिक्षा, और फिरभी वो आध्यात्मिक कमी के शिकार होते हैं और उनमें उस पोषण की कमी होती है जो जीवन में एक उद्देश्य होने से मिलता है। हम में से ज्यादातर लोग शर्मिंदगी के डर से एक नाव में ज़ोर-ज़ोर से नहीं गाएंगे!

पार्कर पामर (...) ने लिखा था, "ऐसी कोई सज़ा नहीं है जो हमको कोई दूसरा दे सके जो उस सज़ा से बदतर है जो हम अपने को शक्तिहीन करने की साज़िश में अपने आपको देते हैं।

विचार के लिए कुछ मूल प्रश्न: आप “स्वतन्त्र रहने” और “स्वतंत्रता से पाने” के बीच के भेद से क्या समझते हैं? क्या आप अपना कोई निजी अनुभव बांटना चाहेंगे जब आपने महसूस किया हो कि आप जो होना चाहते थे आप वो हो सके? ऐसी कौनसी साधना है जो आपको यह समझने में मदद करती है कि आप अपने भय से कहीं बड़े है?

डॉना मार्कोवा की पुस्तक, “मैं इस जीवन को बिना जिए नहीं मर जाऊँगी - उद्देश्य और जोश को फिर से पाना” से उद्धरित
 

Excerpted from Dawna Markova's book, "I will not Die an Unlived Life: Reclaiming Purpose and Passion."


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