जहाँ सबसे लंबा प्रकाश, एकत्रित होते अंधकार से मिलता है , द्वारा शैनन विलिस
पूरे जीवित संसार में, प्रचुरता और क्षय, फलना-फूलना और हानि, एक ऐसी अंतरंगता में एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं, जिसे हमारी औद्योगिक पुराण कथाओं ने हमें भूलना सिखा दिया है।
इस ऋतु के भीतर खड़ा होना, यह याद करना है कि हम इन चक्रों से अलग नहीं हैं, बल्कि इनके सहभागी हैं—ऐसे जीव हैं जो एक विशाल, सजीव संवाद में बुने हुए हैं। क्योंकि संसार उस प्रगति के रैखिक वादों के अनुसार नहीं चलता, जिन्होंने आधुनिकता की कल्पना को इतने गहरे रूप से आकार दिया है। वह ज्यादातर एक जंगल की धरती की तरह चलता है, जहाँ क्षय और उद्भव एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, जहाँ अंत, आरंभ को पोषण देते हैं, और जहाँ अदृश्य माइसीलियल नेटवर्क अंधकार के माध्यम से भविष्य की ओर पोषण, स्मृति और संभावनाएँ पहुँचाते हैं—ऐसे भविष्य की ओर, जिसकी पूरी कल्पना कोई एक जीव स्वयं नहीं कर सकता।
यह पवित्र भाग कहीं और नहीं है। वह इन आदान-प्रदानों में बुना हुआ है ,जैसे मिट्टी और जड़ के, नदी और वर्षा के, दुःख और नवीनीकरण, के पारस्परिक संबंधों में।
शायद इस ऋतु का निमंत्रण यह नहीं है कि हम और अधिक मजबूत जमीन खोजें, बल्कि यह सीखें कि कम्पित जमीं के ऊपर कैसे रहा जाए।
न तो संकट में पड़े इस संसार के स्वामी बनकर, न ही बचाए जाने की प्रतीक्षा करते हुए पीड़ित बनकर, बल्कि एक ऐसे जीवंत और अधूरे संवाद के सहभागी बनकर, जिसका परिणाम अभी भी सुंदर है, और कभी-कभी भयावह रूप से—अनिश्चित भी है। उस सीमा-क्षण पर उपस्थित रहना।उस बात को सुनना जो इस शोर के नीचे उभर रही है।
यह याद रखना कि उलझने और बिखरने के समय में भी, संसार धैर्यपूर्वक अपना काम करता रहता है—जो कुछ टूट गया है, उसी से नए संबंधों को बुनने का काम। क्योंकि जब सूर्य अपनी सबसे ऊँची ऊँचाई तक पहुँचता है, तब यह चक्र चुपचाप अंधकार की ओर अपनी यात्रा शुरू कर देता है। पृथ्वी, जैसा कि वह अक्सर करती है, हमें याद दिलाती है कि चरम और अवरोह ( उत्थान एवं पतन) एक ही कहानी के हिस्से हैं।
मनन के लिए बीज-प्रश्न : आपके अन्दर क्या बदलाव आता है , जब आप इस धारणा पर विचार करते हैं कि यह संसार ज्यादातर “जंगल की धरती की तरह” चलता है—जहाँ क्षय और उद्भव अलग नहीं हैं, जहाँ अंत चुपचाप आरंभ को पोषण देते हैं? क्या आप अपने जीवन की ऐसी कोई व्यक्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं, जब आपके जीवन में से कुछ टूटकर बिखर गया, और बाद में उसी ने स्वयं को उस जमीन के रूप में प्रकट किया, जहाँ से कुछ नया बुना जा रहा था? आपको “ कम्पित जमीन के ऊपर रहने” में क्या मदद करता है—अर्थात् अनिश्चितता की सीमा पर उपस्थित बने रहना, बिना किसी झूठी/कृत्रिम स्थिर जमीन को पकड़ने की कोशिश किए, और बिना उस चीज़ से दूरी बनाते हुए, जो अभी अधूरी और जीवंत है?
For over 30 years Shannon Willis has committed her life to partnership with others in transforming trauma and cultural wounding for both the living and the dead. She has a Masters degree in Professional Leadership and Counseling with a focus in Jungian and Gestalt modalities, is the founder of Red Earth Healing, a student of Yoruba culture as an initiate of Ọbàtálá, and Ọ̀ṣun, in the lineage of Olúwo Fálolú Adésànyà Awoyadé from Òdè Rẹ́mọ. making pilgrimages to work with elders in West Africa. Excerpted from here.
What shifts in you when you consider the notion that the world moves "more like a forest floor" - where decay and emergence are inseparable, where endings quietly feed beginnings? Can you share a personal story of a time when something in your life came apart and, only later, revealed itself to be the ground from which something new was being woven? What helps you "inhabit the trembling" - to stay present at the threshold of uncertainty without reaching for false ground or turning away from what feels unfinished and alive?