संकल्प से जिएं, सौदेबाजी से नहीं
⁃ कोशिन पाले एलिसन के द्वारा
जैसे-जैसे नया साल करीब आता है, मैं 'संकल्प' (Vow) के बारे में सोचने लगता हूँ। ज़ेन समुदायों में, यह अपनी प्रतिबद्धताओं को दोहराने का पारंपरिक समय है। यह नए साल के आम वादों जैसा नहीं है, बल्कि यह हमारे जीने के तरीके और हमारी पहचान के लिए बहुत ज़रूरी चीज़ है। सालों तक, मैं (zendo) ध्यान कक्ष में बैठकर यही सोचता था: 'मैं कैसा कर रहा हूँ? क्या आपको नहीं लगता कि मैं अच्छा हूँ? क्या मुझे इसके लिए कोई ईनाम या शाबाशी मिल सकती है?
लेन–देन (सौदेबाजी) वाली सोच के साथ, हम हर चीज़ को तौलते हैं। क्या वह ध्यान अच्छा था या बुरा? क्या मेरा मन लगा रहा या भटक गया? फिर हम तय करते हैं कि यह अभ्यास हमारे काम का है भी या नहीं।
एक पुरानी कहावत है: "कितना दुखद है इन सांसारिक चक्करों में फँसे रहना।" जब मैं इस लेन-देन(सौदेबाजी) वाली सोच में फँसता हूँ और हर काम के बदले तारीफ या क्रेडिट चाहता हूँ, तो यह बहुत दुख देता है। तब अध्यात्म भी सिर्फ एक ऐसी जगह बन जाता है जहाँ मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे पहचानें और कहें कि मैं बहुत अच्छा हूँ।
संकल्प ऐसा नहीं होता, यह कोई सौदा नहीं है। यह उस सांचे या आकार के बारे में है जिसमें हम अपना जीवन ढालते हैं। संकल्प के साथ जीना ही असली अभ्यास है।
महात्मा बुद्ध ने कहा था कि संकल्प हमारे अभ्यास की रीढ़ की हड्डी है। इसके बिना सब ढह जाता है। हमारा बोधिसत्व संकल्प बोधिधर्म से आता है, जिन्होंने कहा था: 'दुनिया में दुख बहुत बड़ा है, मैं इसे खत्म करने का संकल्प लेता हूँ। भले ही लोग अनगिनत हों, मैं उन सबको बचाने का संकल्प लेता हूँ।'
अपनी शिक्षा में बोधिधर्म ने कहा था: 'जो लोग बिना किसी पक्के संकल्प के सही रास्ते की तलाश करते हैं, वे बिना नींव के घर की तरह होते हैं।'
बोधिधर्म के विचारों में कोई फालतू भावुकता नहीं है। इसीलिए मैं उन्हें पसंद करता हूँ। वह हमें यह कहकर ढील नहीं देते कि 'कोई बात नहीं, यह मुश्किल है।' बल्कि वह कहते हैं, 'हाँ, यह मुश्किल है।' और वह पूछते हैं, 'आपके जीवन की नींव क्या है?(आपका जीवन किन मूल्यों और सिद्धांतों पर टिका है?) आपके जीवन के केंद्र में क्या है?(वह कौन सी गहरी सच्चाई या मकसद है जिसके इर्द-गिर्द आपकी पूरी दुनिया घूमती है?)
यह सिर्फ मेरे या आपके बारे में नहीं है। और यह सिर्फ आज के समय के बारे में भी नहीं है। हम कल, आज और आने वाले कल—हर समय में इस दुनिया की सेवा करने का संकल्प ले सकते हैं।
दोगेन ज़ेंजी 'एहेई कोरोकु' में कहते हैं कि संकल्प ही अभ्यास का हृदय है। संकल्प के बिना न तो कोई अभ्यास है और न ही किसी कोई सच्चाई का अनुभव। अगर हम अपनी हर चीज विचार, शब्द (बात)और काम(एक्शन) में अपने संकल्प को नहीं जी रहे, तो समझो कोई अभ्यास नहीं हो रहा।
यह ज़रूरी नहीं है कि मैं अपने संकल्प के बारे में क्या बोलता हूँ। संकल्प दुनिया से किया गया कोई वादा नहीं है। यह हमारे जीवन को जीने का एक तरीका है। क्या यह तरीका हमारे आस-पास के लोगों को हमारे कामों में दिखेगा?
संकल्प वह नहीं जो हमारे दिमाग में है। संकल्प वह है जो हम अपने शरीर से और अपने जीवन में असलियत में करते हैं। इसमें एकदम परफेक्ट होना ज़रूरी नहीं है। मेरे गुरु ने कहा था: 'तुमसे परफेक्ट होने के लिए नहीं, बल्कि संकल्प पर टिके रहने के लिए कहा गया है।'
परफेक्ट होने की कोशिश जल्दी हार मान लेती है, लेकिन संकल्प इंसान को सीधा खड़ा रखता है। हममें से कई लोग पीछे मुड़कर पछताते हैं—'मैं इतने सालों से क्या कर रहा था?' इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि आप अभी क्या कर रहे हैं।
आत्मचिंतन के बीज प्रश्न:
1.जब हम संकल्प को दूसरों की नज़र में अच्छा दिखने की , या पूर्णता पाने की कोशिश के बदले, अपने जीवन की दिशा तय करने का माध्यम मानते हैं—तो उसमें क्या फर्क आता है? 2.क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी पक्के संकल्प ने आपको बाँधने के एहसास के विपरीत, भीतर से हल्का और मुक्त महसूस कराया हो? 3.आपको क्या सहारा देता है यह समझने में कि संकल्प कोई कठोर नियम नहीं, बल्कि जागरूक होकर जीने का अभ्यास है?
Seed Questions for Reflection
What do you make of the notion that living by vow is about the ‘shape we give our life’ rather than seeking credit or perfection? Can you share a personal story that reflects a time when you paradoxically felt free after taking a vow? What helps you see ‘living by vow’ as a place of practice?