प्रेम स्वयं ही लुप्त हो गया
⁃ लियोनार्ड कोहेन के द्वारा
खिड़की से रोशनी भीतर आई
सीधे ऊपर से सूर्य की किरणें
और मेरे छोटे से कमरे में
प्रेम की किरणें समा गईं।
प्रकाश की धाराओं में मैंने स्पष्ट देखा
वो धूल जो आमतौर पर दिखाई नहीं देती
जिससे ‘नामहीन’
मेरे जैसे किसी के लिए एक नाम बना देता है।
मैं थोड़ा और कहने की कोशिश करूंगा
प्रेम चलता रहा, बढ़ता रहा
जब तक कि वह एक खुले दरवाजे तक नहीं पहुँच गया –
और फिर प्रेम
स्वयं प्रेम ही चला गया।
सारी धूल धूप में व्यस्त थी
धूल के कण तैरते और नाचते रहे
और मैं भी उन्हीं के साथ
आकारहीन परिस्थिति में बह गया।
मैं थोड़ा और कहने की कोशिश करूंगा
प्रेम चलता रहा, बढ़ता रहा
जब तक कि वह एक खुले दरवाजे तक नहीं पहुँच गया –
और फिर प्रेम
स्वयं प्रेम ही लुप्त हो गया।
फिर मैं लौट आया जहां से मैं गया था
मेरा कमरा वैसा ही दिख रहा था -
लेकिन अब 'नामहीन' और 'नाम' के बीच
कुछ भी शेष ( बचा) नहीं था।
सारी धूल धूप में व्यस्त थी
धूल के कण तैरते और नाचते रहे
और मैं भी उन्हीं के साथ
आकारहीन परिस्थिति में बह गया।
मैं थोड़ा और कहने की कोशिश करूंगा
प्रेम चलता रहा, बढ़ता रहा
जब तक कि वह एक खुले दरवाजे तक नहीं पहुँच गया –
और फिर प्रेम
स्वयं प्रेम ही लुप्त हो गया।
और फिर प्रेम
स्वयं प्रेम ही लुप्त हो गया।
मनन के लिए मूल प्रश्न:
आप इस विचार को कैसे समझते हैं कि प्रेम भी सूर्य की रोशनी की तरह हमारे जीवन के अनदेखे पहलुओं को उजागर कर सकता है और फिर किसी खुले दरवाजे से ख़ुद ही चला जाता है, और हमें एक आकारहीन स्थिति में छोड़ देता है।
क्या आप अपने जीवन की कोई ऐसी व्यक्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं, जब आपने ख़ुद को प्रेम या प्रकाश में पूरी तरह डूबा हुआ अनुभव किया हो, लेकिन वह भावना धीरे-धीरे बदल गई या मिट गई, जिससे आपकी पहले की परिचित दुनिया की धारणा बदल गई?
जब ऐसा लगता है कि प्रेम लुप्त हो गया है और केवल ‘नाम’ और ‘नामहीन’ का रहस्य रह गया है तब आपको वर्तमान में टिके रहने और प्रेम की परिवर्तनकारी शक्ति के लिए खुले रहने में क्या मदद करता है?
Leonard Cohen was a Canadian songwriter, singer, poet, and novelist. Sourced from
here.
Seed Questions for Reflection
What do you make of the notion that love, like sunlight, can illuminate the unseen aspects of our lives and then, as if through an open door, vanishes leaving us in a state of formless circumstance? Can you share a personal story that reflects a moment in your life when you felt immersed in love or light, only for it to transform or fade away, altering your perception of what was once familiar? What helps you remain present and open to the transformative power of love, especially when it seems to have vanished, leaving you in the mystery of the nameless and the named?