From Being Driven To Being Drawn


Image of the Weekधकेलेजाने से प्रेरित होने तक
रिचर्ड रोह्र

जवानी में मुझे विचार और किताबें बोहोत पसंद थीं और आज भी मै काफी पढ़ता हूँ। पर हर बार जब मै एक लम्बे आश्रम निवास से वापस आता हूँ मुझे अगले कुछ हफ़्तों या महीनो तक कोई किताब पढ़ने का मन नहीं होता। क्यूँकि मुझे पता है के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्तरों पर मुझे जो अनुभव प्राप्त हुए है वो दुनिया की किसी किताब में नहीं मिल सकते।

अगर आप मुझसे पूछते हैं के मुझे क्या पता है तो मुझे आप को बताना होगा। मुझे सिर्फ इतना पता है के जीवन में एक गहरा ठीक-है का भाव है - सभी विरोधाभासों के होते हुए - जो मौन में और भी स्पष्ट हो जाता है। हालाँकि यह स्तिथि भयंकर, विरोधाभासपूर्ण, अन्यायी और असामंजस्यपूर्ण है, किसी तरह ख़ुशी और ग़म साथ में आसरा धुंध ही लेते हैं। नकारात्मकता और सकारात्मकता एक दूसरे को नहीं काटते।

जीवन में आपका जो भी ध्येय हो वह जीवन के प्रति एक बुनियादी " हाँ " से प्रेरित होना चाहिए। अन्याय और हर प्रकार के अप्रेम को आपके द्वारा भेजा गया " ना " मौन में और भी स्पष्ट होगा पर अभी तुम्हारे काम में घ्हाव भरने के क्षमता है। किसी ध्येय के लिए काम करते हुए लोगों में फर्क दिखता है : सामाजिक-न्याय के कितने सारे कामों को उन लोगों ने ख़त्म कर दिया है जो अपने संकीर्ण, स्वार्थी, गुस्से के माध्यम से लड़ते रहते हैं।

अगर आपकी प्रार्थना गहरी है तो भय और प्रतिक्रिया का आपका नजरिया बदल कर एक गहरे और सकारात्मक सम्बंद का होगा - क्यूँकि अब तुम नाजुक और अपने आप में बंद अस्तित्व से बाहर हो। ध्यान में हम अहंकार-सजगता से आत्मिक-सजगता के और बढ़ रहे हैं, बुरी भावनाओं से न प्रेरित होते हुए अंदर के सकारात्मक स्रोत के प्रति प्रेरित होना।

ध्यानपूर्ण प्रार्थना के निरंतर अभ्यास से आप देखेंगे के आप इसके या उसके बजाय सभी के बारे में सोच रहे हो। यह कला संतों और फकीरों को माफ़ करने की, दुःख को भूलने की, दयावान होने की, और अपने दुश्मन को भी प्यार करने की ताकत देती है।

मनन के लिए प्रश्न :
सभी विरोधाभासों के होते हुए जीवन में एक गहरा ठीक-है का भाव को कैसे समझते हो ?
एक निजी अनुभव बाँट सकते हो जब आप नकारात्मक प्रेरणाओं से ध्यान हटा कर अपने अंदर स्तिथ सकारत्मकता पर ध्यान लगाया हो ?
शुद्ध-उपचार और क्रोध-अहंकार के बीच हमें उपलब्ध चुनाव को याद रखने में क्या मदद करता है ?

 

Adapted from Richard Rohr, Dancing Standing Still: Healing the World from a Place of Prayer


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