विज्ञान का सही वैभव
-- लेखक: एलेन वाट्स
विज्ञान का सही वैभव केवल इसमें नहीं कि वह नामकरण और वर्गीकरण करता है, आँकता और भविष्यवाणी करता है अपितु इसमें है कि वह अवलोकन करता है और तथ्यों को जानने की इच्छा करता है, चाहे जो भी तथ्य सामने आये। वह चाहे परम्पराओं को तथ्य समझने की भूल करे या हकीकत को मनमाने विभागों में बाँटने की नादानी, परन्तु यह विज्ञान की ग्रहणशीलता और ईमानदारी है कि वह उसे धर्म के साथ समानता प्रदान करती है। जो वैज्ञानिक विज्ञान की जितनी अधिक ऊंचाई तक पहुंचा है वह उतना ही वास्तविकता के बारे में अपनी अज्ञानता से प्रभावित हुआ है, और उतना ही अधिक यह समझा है की वैज्ञानिक नियम और सिद्धांत, उसके विभाजन और परिभाषाऐं, ये सब उसके अपने विचारों की उपज हैं। वे उसे अपने खुद के लिए दुनिया का उपयोग करने के प्रयोजन तैयार करने के काम आते हैं, बजाय के वास्तविकता को समझने और समझाने के लिए।
जितना अधिक वह इस संसार को छोटे छोटे भागों में बाँट कर विश्लेषण करता है, उतना अधिक वह वर्गीकृत करने के लिए पाता है और उतना ही अधिक सब वर्गीकरण की आपसी पराधीनता एवं सापेक्षता को जानता है। उसकी अनभिज्ञता उसके ज्ञान से कहीं अधिक तेजी से बढ़ती मालूम होती है। वह निरंतर उस सीमा की ओर बढ़ता चला जाता है जहाँ उसकी अज्ञानता शब्दों के जाल में बंद एक छोटे से बिंदू से बढ़कर मन के आँगन में एक द्वार बन जाती है, और यह द्वार अंधकार का नहीं अपितु विस्मयता और आश्चर्य का द्वार है।
डरपोक मन एक धमाके के साथ इस द्वार को बन्द कर देता है, और अपनी अज्ञानता के प्रति मूक और विचारविहीन बन जाता है, ताकि अपने परिचित ज्ञान के बारे में अधिकाधिक सोच कर, उसके शोर में मंत्रमुग्ध रह सके। वह अज्ञात के रिक्त स्थान को, पहले से ज्ञात बातों का ही निरंतर मंथन करके भरता रहता है। लेकिन एक खुला मन यह जानता है कि जिन ज्ञात क्षेत्रों का उसने बारीकी से अनेकों बार अन्वेषण किया है वह वास्तव में तो ज्ञात हैं ही नहीं, केवल चिह्नित और हज़ारों बार मापित ही हैं। और मन जिसे चिन्हित और मापित करता है उसका गूढ़ रहस्य यह है कि अंततः यह प्रक्रिया हमें विचारों के उस पार ले जाती है जहाँ मन अपने भ्रमण और मंथन को छोड़ कर यह जान लेता है कि इस क्षण में उसका यहाँ होना ही एक बड़ा चमत्कार है।
इस तरह के आश्चर्य में लालसा नहीं, पूर्ति होती है। लगभग हर एक ने इसका अनुभव किया है, लेकिन कुछ ऎसे विरले क्षणों में जब किसी दृश्य की चौंकाने वाली सुंदरता ने मन को अपने अंतर-भ्रमण से दूर खींच लिया और एक पल के लिए इस अनुभव को विचारों की सीमा में बाँधने में असमर्थ बना दिया। इसलिए हम अत्यंत भाग्यशाली हैं कि हम ऎसे समय में रहते हैं जब मानव का ज्ञान उस सीमा तक पहुँच गया जहाँ उसकी अभिव्यक्ति के लिए शब्द पर्याप्त नहीं रह गए हैं। यह केवल गूढ़ और अद्भुत वास्तविकता के लिए ही नहीं लेकिन सबसे सामान्य वास्तविकता के लिए भी हो रहा है। अलमारियों पर लगी धूल भी आज उतना ही बड़ा रहस्य है जितना की दूरस्थ सितारों का प्रकाश; दोनों के बारे में आज इतना पर्याप्त पता है की यह स्पष्ट है की हमें कुछ नहीं पता। एडिंग्टन, भौतिक विज्ञानी, मनीषियों के सबसे नजदीक हैं, अपनी कल्पना की उड़ान के लिए नहीं, लेकिन उनके इस कथन मात्र से: "कुछ अज्ञात ऐसा कुछ कर रहा है जो हम नहीं जानते।" ऐसे एक कथन ने सोच की संपूर्ण परिक्रमा को पार कर आरम्भ में ला खड़ा किया है, और हम फिर से बच्चों के रूप में आ गए हैं।
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आत्म निरिक्षण के लिए प्रश्न :-
आपके लिए विज्ञान का वैभव क्या है? क्या आप एक निजी अनुभव बाँट सकते हैं जहाँ आपने इस क्षण के चमत्कार का अनुभव किया हो? क्या आपकी ऐसी कोई साधना है जो आपको ज्ञात की आरामदायक परिधि से निकल कर प्रत्यक्ष क्षण के चमत्कार का अनुभव करने में मदद करती है?
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यह पद्य एलेन वाट्स की पुस्तक “द विस्डम ऑफ इन्सिक्योरिटी“ से लिया गया है।
Alan Watts is ... The excerpt above is from his book, 'The Wisdom of Insecurity.'
Seed Questions for Reflection
What is the true splendor of science for you? Can you share an experience where you felt the miracle of being at the present moment? What practice helps you avoid the comfort of the familiar and remain open to the miracles of the present moment?