लाओस में सूर्योदय
- पैम ह्यूस्टन ( 24 अक्टूबर, 2012)
मैं पर्वतों की दीवानी हूँ, और एशिया में मेरी सबसे मनपसंद जगहें हैं वहां बर्फ से ढकी हिमालय की नोकीली पर्वत-मालाओं के बीच छुपे मठ। पर दक्षिण में स्थित नम घाटियों पर मेरा खिचाव लाओस वासियों की कथित दयालुता और अभी शुरू होने वाले प्रातःकाल के समारोह से हुआ।
मुर्गे ने बांग दी । मोर ने कूक की । और फिर उसके बाद मठों से घंटों का आपसी संवाद सुनाई देने लगा ।
जब मठवासियों का झुण्ड प्रार्थना सभा की चट्टानी सीढ़ियों से उतरता हुआ आता है तो पहली नज़र में ऐसा मालूम होता है जैसे सलेटी राग की सड़क, धूलभरी पगडंडी और धूमिल, अस्थिर आकाश की पृष्ठभूमि में कोई रंगों से परिपूर्ण नदी, जैसे कोई केसरिया मलमल की पट्टी, आँखों को चौकन्ना कर देती है ।
पूरे एशिया में मठवासी हल्दी, जीरे और लाल मिर्च जैसे मसालों के रंगों के लबादे पहनते हैं। लुआंग प्रबांग में हर लबादा एकदम उज्जवल केसरिया रंग का होता है, एक लम्बे पाँव तक पहुंचते कपडे को मठवासी अपने शरीर पर काफी जटिल तरीके से लपेटते हैं और फिर उसे पीले रंग के कमरबंद से बांधते हैं।
जब वे पास से गुज़रते हैं तो एक मठवासी का दूसरे मठवासी से भेद नहीं किया जा सकता, सबके हाथ पेट के आगे बंधे हुए, उसी आकर में जैसे उनके लकड़ी के बने भिक्षा-पात्र ।
बिलकुल मीकोंग नदी की तरह, जिसके तट पर वे रहते हैं, मठवासियों का ये दरिया चलता रहता है, वे निःशब्द, ध्यानशील चलते रहते है, जो लगता है जैसे दो भाग चलना हो और एक भाग तैरना । एक-एक करके वे धीरे-धीरे उस महिला के पास से गुज़रते हैं जो मालूम होता है जैसे खुद भी अपनी हर हरकत एक खास लय से कर रही है: एक बड़ा चमचा गरम-गरम चावल हर एक हाथ के कटोरे में डालती है, पुनः चमचे को भरती है, अगले कटोरे में छोडती है, और फिर से भरती है । हर मठवासी उस महिला के आगे सर झुकाता है और आगे बढ़ जाता है ।
हर कुछ गलियों के बाद यही घट रहा है: अलग महिला, अलग मठवासी; वही चमकती हुई, सुन्दर नदी जैसे उस महिला के सामने से बहती हुई गुज़र रही हो । और फिर कुछ गलियों के बाद वही संदिग्ध रंगों की दमक, और फिर कुछ और गलियों के बाद फिर वही । यहाँ साल पर साल, साल के 365 दिन, बिलकुल यही होता है ।
औरतें बहुत सवेरे उठती हैं, अंधरे में ही खाना पकाती हैं, और सुबह की पहली किरणों के साथ ही खाना और छोटा सा मेज़ लेकर निकल पड़ती हैं । फिर मठवासी जैसे अंधकार के बीचों-बीच जलती, छोटी सी आग की तरह हौले-हौले उन औरतों के चावल भरे बर्तनों और साथ ही उनके बोझ को हल्का करते जाते हैं|
हौले-हौले सूर्य की चमक बढ़ने लगती है । करीब एक घंटे में कोहरा छंट जाएगा और गर्मी बढ़ने लगेगी ।
जब मठवासी वापिस अपने मठ की सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगते हैं, वहां कहीं हल्की-सी आग का संकेत, या किसी मठवासी के केसरिया लबादे की बांह का लहलहाना, ऐसा मालूम होता है जैसे वे करुणा और उदारता की कोई जादुई चाल चलते हुए, दुआएं देते भी रहें हैं और दुआएं लेते भी रहें हैं ।
- - पैम ह्यूस्टन
Seed Questions for Reflection
The author captures a scene made possible by great diversity and yet great unity through interdependence - what do you understand by unity in diversity? How can we avoid the trap of seeking unity through uniformity, and instead, learn to appreciate unity in diversity? Can you share a personal experience of a time when you saw unity in the diversity in front of you?