अद्वैत और अज्ञात का रहस्य
एक बुद्धिमान मन जब अपनी सीमाओं को पहचान लेता है, तो यह अपने आप में एक सुंदर बात होती है।
जब आप अपने समस्त ज्ञान को पकड़े रहना छोड़ देते हैं, तब आप अस्तित्व की एक अलग अवस्था में प्रवेश करने लगते हैं। आप एक अलग आयाम में जाने लगते हैं। इस आयाम में आपके भीतर का अनुभव बहुत शांत होने लगता है। मन शायद अब भी पृष्ठभूमि में अपनी बातें करता रहे, या शायद बिल्कुल शांत हो जाए। लेकिन आपकी चेतना अब मन की गतिविधियों से परेशान नहीं होती। आपको मन को रोकने की आवश्यकता नहीं है। आपकी जागरूकता ज्ञान की उस दीवार के पार चली जाती है और एक अत्यंत शांत अवस्था में प्रवेश कर जाती है।
इस शांति में आपको एहसास होता है कि आप वास्तव में कुछ नहीं जानते, क्योंकि अब आप अपने अर्जित ज्ञान की ओर देखने के लिए मन की ओर नहीं लौट रहे होते। यह शांति मन के लिए एक रहस्य है। यह कुछ ऐसा है जो अज्ञात है। जैसे-जैसे आप इसकी गहराई में उतरते हैं, आप उस चीज़ के और गहरे अनुभव में प्रवेश करते हैं, जो एक महान रहस्य जैसी प्रतीत होती है।
अब मन बीच में आकर जानना चाहेगा कि क्या हो रहा है। वह हर चीज़ को परिभाषित करने की कोशिश करेगा। लेकिन इससे अनुभव में कोई और गहराई नहीं आएगी। यदि आप उसे खुलने दें, यदि आप नियंत्रण छोड़ दें, तो यह रहस्य अपने आप परत-दर-परत खुलता चला जाता है।
जब अर्जित ज्ञान पीछे छूटने लगता है, तो आप पाते हैं कि आप अपने उस परिचित स्वरूप को भी पीछे छोड़ चुके हैं, जिसे आप अब तक अपना 'मैं' समझते थे। वह स्वरूप केवल ज्ञान और अनुभव के संचय में ही अस्तित्व रखता था।
जब आप यह सब पीछे छोड़ देते हैं, तो कुछ बहुत रोचक घटित होता है, क्योंकि आप सचमुच अपनी स्मृतियों को पीछे छोड़ रहे होते हैं। आप उस पहचान को पीछे छोड़ देते हैं जो आपने अपने बारे में बना रखी थी; अपने माता-पिता के बारे में बनाई गई धारणाओं को और उन तमाम बातों को भी, जिन्हें आप सच मानते आए थे। बीता हुआ कल जा चुका है।
तब एक बहुत रोचक बात दिखाई देने लगती है: आप यह सब पीछे छोड़ सकते हैं और फिर भी आपका होना बना रहता है। आप यहाँ हैं, इसी क्षण में हैं। तब आप जो हैं, वह और भी रहस्यमय हो जाता है।
जब आपको एहसास होता है कि आप अपने बारे में बनाई गई हर परिभाषा को छोड़ सकते हैं और फिर भी आपका अस्तित्व बना रहता है, तब आप समझने लगते हैं कि ये विचार आपका वास्तविक स्वरूप नहीं हो सकते।
दूसरे शब्दों में, जब आप अपने विचारों के सहारे स्वयं को अस्तित्व में बनाए नहीं रख रहे होते, तब आप कौन होते हैं?
उस पहचान के क्षण में ही आप संचित ज्ञान की दीवार से आगे बढ़ने लगे होते हैं। फिर, यदि आप उस क्षण को कोई नाम या परिभाषा देकर दोबारा किसी अवधारणा में नहीं बाँधते, यदि आप अपने बारे में फिर से सोच-सोचकर अपनी पुरानी पहचान नहीं गढ़ते, तो आपका वास्तविक स्वरूप स्वयं प्रकट होने लगता है।
मनन के लिए मूल प्रश्न
1. क्या आपको अपने जीवन में ऐसा कोई क्षण याद आता है, जब आपने किसी बात को समझने, उसका अर्थ निकालने या उसे अपने तर्क से सुलझाने की कोशिश छोड़ दी हो और बस उसे उसके रहस्य सहित स्वीकार किया हो? उस अनुभव ने आपको क्या दिखाया?
2. हम जो स्वयं को मानते हैं, वह बहुत हद तक हमारी स्मृतियों, अनुभवों और अपने बारे में बनाई गई कहानियों से निर्मित होता है। क्या आपने कभी ऐसा क्षण अनुभव किया है, जब ये सारी पहचानें कुछ देर के लिए विलीन हो गई हों और आपने केवल अपने होने को महसूस किया हो? वह अनुभव कैसा था?
3. अपने रोज़मर्रा के जीवन में, अपने ज्ञान और धारणाओं की पकड़ को थोड़ा ढीला करके किसी व्यक्ति या परिस्थिति को नए नज़रिए से देखना कैसा हो सकता है? अपने भीतर अज्ञात के लिए जगह बनाने में आपको किस बात से मदद मिलती है?