आइए, फिर से उसी काम की ओर लौटें। द्वारा रंदाल्ल एम्स्टर
इसका जो भी महत्व हो, मेरी दुनिया में एक चीज़ ऐसी है जो वास्तव में इन सब बातों को केवल सामना करने या किसी तरह सहने की अवस्था से आगे ले जाकर जुड़ाव की जगह तक पहुँचाने में मदद करती है—और वह है बस फिर से काम पर लौटने जैसा सरल कार्य।
इससे मेरा मतलब “काम” से धन प्राप्त करने की रणनीतिक कोशिश, केवल उत्पादकता के लिए उत्पादक बने रहना, या बस अधिक से अधिक करते जाना, नहीं है। मैं इससे कहीं अधिक गहरी, अधिक उद्देश्यपूर्ण और अधिक प्रभावशाली किसी चीज़ की ओर संकेत कर रहा हूँ।
इस तरह का काम हमारे उद्देश्य को जीवन में प्रकट करने के बारे में है; अपना योगदान देने के बारे में है; उन लोगों का सहारा बनने के बारे में है जिनकी हमें परवाह है; दुःख और कठिनाई को रचनात्मक रूप से आश्चर्य और सुंदरता में बदलने के बारे में है; संवाद में अपनी आवाज़ जोड़ने के बारे में है; सुंदरता और अर्थ रचने के बारे में है; बिना किसी कारण के छोटे-छोटे दयालु कार्य करने के बारे में है; ऐसे हस्तक्षेप करने के बारे में है जिनका कोई श्रेय नहीं मिलता, और साथ ही ऐसे उल्लेखनीय कार्य करने के बारे में भी है जिन्हें लोग याद रखें; जड़ता और बाधाओं के पार आगे बढ़ने के बारे में है; दृढ़ विश्वास के साथ अपने मन की बात कहने के बारे में है; अपेक्षा से एक कदम आगे जाने के बारे में है; और वह करने के बारे में है जो कभी असंभव लगता था।
इनमें से किसी भी कार्य का अर्थ यह नहीं है कि उसे महत्वपूर्ण होने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए।
यह उतना सरल भी हो सकता है जितना कि घर में किसी और के जागने से पहले रसोई साफ कर देना, या बच्चों के स्कूल जाने के दौरान उनके कमरों को व्यवस्थित और सुंदर बना देना—ऐसे काम, जिनके लिए शायद कोई प्रत्यक्ष प्रशंसा भी न मिले।
यह कुछ समय बाद गैराज साफ करना हो सकता है, बाड़ पर रंग करना हो सकता है, या बगीचा लगाना हो सकता है।
शारीरिक काम से आगे भी एक संसार है—भावनात्मक और बौद्धिक प्रयासों का संसार: ध्यान की वह कक्षा शुरू करना, पुराना गिटार फिर से उठाना, वह पत्र या डायरी या निबंध लिखना, कुछ देर के लिए अपने संदेहों को अलग रखकर सचमुच हँसना या रोना, या दूर रहने वाले किसी मित्र को फोन करना।
सामूहिक स्तर पर इसका अर्थ है स्वयंसेवा के लिए उपस्थित होना, किसी पड़ोसी की मदद करना, किसी उद्देश्य के लिए अपनी आवाज़ उठाना, अपने समुदाय की स्थानीय कला का समर्थन करना, जीवन में जलवायु के प्रति अधिक अनुकूल कोई परिवर्तन करना, या केवल इसलिए कुछ साझा करना कि दुनिया में थोड़ी-सी और सुंदरता जुड़ जाए।
मेरे लिए, यही जीवन का काम है—जीने का काम। यही वह है जो हमें दोनों , मानवता करने वाला व्यक्ति और मानवता जीने वाला व्यक्ति बनाता है।
बेशक, “काम” का एक दूसरा अर्थ भी है। हममें से बहुत से लोग अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ऐसा काम करते हुए बिताते हैं जो अलगाव पैदा करने वाला, थका देने वाला या शोषणकारी महसूस हो सकता है। उस स्तर पर “काम” को मुक्ति या जुड़ाव के स्रोत के रूप में देखना कठिन हो सकता है।
लेकिन शायद ठीक इसी कारण यह शब्द फिर से अपने अर्थ में वापस लेने योग्य है।
एक काम वह है जो हम इसलिए करते हैं क्योंकि हमें करना पड़ता है, और दूसरा वह काम है जो किसी तरह हमें वापस हमारे अपने अस्तित्व तक ले आता है।
दूसरा काम बाहर से देखने पर शायद महत्वपूर्ण न लगे। कोई बर्तन धोने के लिए तालियाँ नहीं बजाएगा। कोई उस सँवारे हुए बगीचे की प्रशंसा न करे। किसी के पास उस पत्र को लिख देने के लिए पुरस्कार नहीं होगा। मित्र को फोन करने पर कोई सम्मान नहीं मिलेगा। कुछ मिनट चुपचाप बैठने के लिए कोई हमें नहीं देखेगा। और जब कोई देख भी नहीं रहा हो, तब की गई छोटी-सी दयालुता के लिए भी शायद कोई धन्यवाद न मिले।
फिर भी, शायद ये कार्य इतने छोटे हैं ही नहीं।
जब दुनिया की समस्याओं का विशाल आकार हमारी समझ से परे लगने लगे, तब हमारे ठीक सामने मौजूद काम उस विशालता को छोटा और संभालने योग्य बना देता है। वह हमारे हाथों को कुछ करने की जगह देता है। वह अमूर्त चिंता को सहभागिता में बदल देता है।
और ऐसा करते हुए, हमारे भीतर कुछ बदलता है।
जिस चीज़ पर हम काम कर रहे हैं, वह निश्चित रूप से बदल सकती है। कमरा साफ हो जाता है। बीज मिट्टी में चला जाता है। मित्र हमारी आवाज़ सुन लेता है। किसी व्यक्ति को दयालुता प्राप्त होती है।
लेकिन शायद उस प्रक्रिया में हमारे अन्दर भी कुछ बदल रहा होता है ।
जो शुरुआत में हमारे बाहर की किसी चीज़ को बदलने का प्रयास था, वह धीरे-धीरे हमारी अपनी असहायता, अपनी पीड़ा , कृतज्ञता, रचनात्मकता और देखभाल करने की क्षमता से मिलने का एक तरीका बन सकता है।
साधारण और रोज़मर्रा का काम प्रतिरोध और पुनः ऊर्जा पाने की एक जगह बन जाता है।
शायद जीवंत होने का अर्थ भी कुछ ऐसा ही है—यह इंतज़ार करना नहीं कि हम पूरी समस्या को हल कर पाएँगे; और न ही यह मानना कि हर कार्य इतना महत्वपूर्ण होना चाहिए कि वह स्वयं को उचित सिद्ध कर सके।
बल्कि बस यह खोजते रहना कि अगली वह जगह कौन-सी है जहाँ हमारा जीवन हमसे कुछ माँग रहा है—और वहाँ स्वयं को अर्पित कर देना।
एक भोजन।एक बगीचा। एक बातचीत। एक गीत। एक पड़ोसी।एक उद्देश्य।
सुंदरता का एक ऐसा क्षण जिसे बनाने के लिए किसी ने हमसे कहा भी नहीं था।
हमेशा ऐसी बहुत-सी चीज़ें रहेंगी जिन्हें हम ठीक नहीं कर पाएँगे।
बहुत-सी चीज़ें होंगी जिन्हें हम समझ नहीं पाएँगे।
बहुत-सी चीज़ें होंगी जिन्हें हम अपने भीतर उठा नहीं पाएँगे।
लेकिन लगभग हमेशा, हमारे बहुत पास, प्रेम का कोई न कोई काम भी मौजूद होगा।
मनन के लिए बीज-प्रश्न : आप इस धारणा से किस तरह जुड़ते हैं कि दो तरह के काम हैं, “एक काम वह जो हम इसलिए करते हैं क्योंकि हमें करना पड़ता है, और दूसरा काम वह जो किसी तरह हमें वापस हमारे अपने अस्तित्व तक ले आता है”? क्या आप अपने जीवन की ऐसी कोई कहानी साझा कर सकते हैं, जब कोई छोटा-सा काम जैसे, , बिना किसी प्रशंसा के किया गया कार्य—जैसे बर्तन धोना, अंततः वह पत्र लिख देना, या किसी मित्र को फोन करना, आपके बिना ऐसा इरादा किए ही, आपके अपने दुःख, असहायता या देखभाल करने की क्षमता से मिलने का एक माध्यम बन गया हो? जब दुनिया की समस्याओं का विशाल आकार इतना बड़ा महसूस होने लगे कि कुछ भी , बिना दिखे , प्रेमपूर्वक किया गया कार्य पर्याप्त नहीं लगता, तब आपको अपने पास मौजूद “प्रेम के किसी छोटे-से काम” की ओर वापस लौटने में क्या मदद करता है?
Excerpted from here.
How do you relate to the notion that there is "work we do because we have to, and work that somehow returns us to ourselves"? Can you share a personal story of a time when a small, uncelebrated act - the washed dishes, the letter finally written, the friend called - became, without your quite meaning it to, a way of meeting your own grief, helplessness, or capacity for care? What helps you find your way back to "some work of love close at hand" when the scale of the world's troubles makes it hard to believe that quiet, unwitnessed effort could possibly be enough?