संदेह का समाधान अधिक सोचने से नहीं हो सकता अजान पासन्नो
आपकी संदेह करने, डगमगाने और अनिश्चित रहने की प्रवृत्ति है। बेशक जब आप संदेह करते हैं, डगमगाते हैं या अनिश्चित होते हैं, तब आपका ध्यान शिक्षाओं पर केंद्रित हो जायेगा , लेकिन इसी तरह आप बाकी हर चीज़ पर भी संदेह करने लगेंगे।
इसलिए संदेह, अनिश्चितता और असमंजस की समझ को पकड़ना और देखना अच्छा है : कि वे हमारे वे हमारे रोज़मर्रा के जीवन में किस तरह प्रकट होते हैं। प्रतिदिन के जीवन में इसे देखना वास्तव में बहुत रोचक है। यह किस तरह सामने आता है? “क्या मुझे उन फलों में से दो खाने चाहिए या केवल एक ही खाना चाहिए?” यह एक ऐसा क्षण बन सकता है, जहाँ सब कुछ ठहर जाता है,क्या मुझे यह करना चाहिए या वह करना चाहिए? आगे बढ़ना चाहिए या पीछे हटना चाहिए? हम हर चीज़ पर संदेह करने लगते हैं। संदेह धीरे-धीरे हर चीज़ में प्रवेश कर सकता है और फिर वह हमारी आध्यात्मिक शिक्षाओं में भी प्रकट होने लगता है:शिक्षाओं पर संदेह, साधना पर संदेह और स्वयं पर संदेह। “क्या मैं यह कर सकता हूँ? क्या मैं यह नहीं कर सकता? क्या इसे करने का कोई अर्थ भी है? मुझे यकीन नहीं है कि मैं यह कर पाऊँगा।” ये सब संदेह के ही रूप हैं। इसलिए, जब हम यह पहचानने में सक्षम हो जाते हैं कि यह संदेह है और बस सिर्फ संदेह ही है, तब हम आगे बढ़ सकते हैं।
ऐसी स्थिति में शरीर के प्रति सजगता (Mindfulness of the Body) भी बहुत सहायक होती है, इस मायने में कि, मन के माध्यम से स्वयं को समझाते-समझाते आप कभी भी संदेह का समाधान नहीं कर पाएँगे। यदि संदेह ही आपके भीतर गहराई से बैठा हुआ है और बार-बार लौट आने वाली आपकी मूल प्रवृत्ति बन गया है, तो आप कभी भी हर बात को इतनी अच्छी तरह समझ नहीं पाएँगे कि आपके भीतर से संदेह पूरी तरह समाप्त हो जाए।
यह पहचानिए कि संदेह किस प्रकार ,अनिश्चितता की भावना के रूप में, हिचकिचाहट की भावना के रूप में, या किसी विशेष निर्णय अथवा कार्य को लेकर होने वाली असहजता के रूप में प्रकट होता है | इसके बाद, शरीर के प्रति सजगता का अभ्यास करके आप इस संदेह को भेदते हुए उससे आगे बढ़ सकते हैं और कार्य में आगे बढ़ सकते हैं।
कभी-कभी , अभ्यास के हिस्से के तौर पे ही सही, गलत निर्णय लेना और कुछ कर डालना भी उपयोगी होता है। कम-से-कम इससे हम असमंजस और अनिश्चितता में फँसे रहने से बच सकते हैं। किसी काम को करने से पहले पूरी तरह आश्वस्त होना कि हम जो कर रहे हैं, वह बिल्कुल सही ही है,यह चाह भी हमें निष्क्रिय कर देती है और हमें उलझाकर रख देती है।
चिंतन के लिए बीज प्रश्न :- इस धारणा से आपका क्या संबंध है कि संदेह , जब एक बार जड़ पकड़ लेता है , तो वह धीरे-धीरे हर चीज़ में प्रवेश करने लगता है? क्या आप अपने जीवन की ऐसी कोई घटना साझा कर सकते हैं, जब शरीर के प्रति सजगता ने आपको संदेह से बाहर निकलने उसके पश्चात कोई कदम उठाने में सहायता की हो? कोई भी कदम उठाने से पहले पूरी तरह आश्वस्त होने की इच्छा से उत्पन्न निष्क्रियता और जड़ता, से बाहर निकलने में आपको किस चीज़ से मदद मिलती है?
How do you relate to the notion that doubt, once it takes root, has a way of "creeping into everything"? Can you share a personal story of a time when mindfulness of the body helped you move through doubt and take action? What helps you move through the paralysis of wanting to be "absolutely sure" before acting?