“हास्य व्यंग में श्रद्धा”
पॉप फ्रांसिस के द्वारा
जीवन में दुख आना तय है, जो हर आशा और परिवर्तन के रास्ते का हिस्सा है। लेकिन यह ज़रूरी है कि हम उदासी में डूबे नहीं रहें और न ही उसे अपने दिल को कड़वा बनाने दें।
इन प्रलोभनों से पादरी भी अछूते नहीं हैं। और कभी-कभी हम दुखी, कठोर पादरी जैसे लगते हैं जो अधिकार देने वाले कम और हुक्म चलाने वाले ज़्यादा होते हैं, विवाहित चर्च के बजाय अकेले बूढ़े पुरुष(old bachelor) जैसे, सेवक के बजाय अधिकारी जैसे, और खुशमिज़ाज के बजाय घमंडी जैसे। यह भी सही नहीं है। लेकिन सामान्यतः, हम पादरी हास्य का आनंद लेते हैं, हमारे पास चुटकुलों और मज़ेदार कहानियों का अच्छा-खासा भंडार होता है, जिन्हें हम सुनाने में भी अच्छे होते हैं और जिनका विषय हम खुद भी बनते हैं।
व्यंग्य एक ऐसी दवा है, जो न केवल दूसरों को हल्का और प्रसन्न कर सकती है, बल्कि हमें भी प्रसन्न करती है। खुद पर हँसना आत्ममोह की प्रवृत्ति को हराने का एक शक्तिशाली तरीका है। आत्ममुग्ध लोग हमेशा आईने में खुद को निहारते रहते हैं, खुद को सजाते रहते हैं, लेकिन आईने के सामने सबसे अच्छी सलाह यह है कि हम खुद पर हँसे। यह हमारे लिए अच्छा है। यह उस कहावत को सच साबित करता है कि दो ही प्रकार के लोग पूर्ण होते हैं: एक जो मर चुके हैं, और दूसरे जो अभी पैदा नहीं हुए हैं।
जहाँ तक आत्ममोह के खतरे की बात है, जिससे हमें आत्म-व्यंग्य की सही मात्रा से बचना चाहिए, मुझे वह चुटकुला याद आता है जिसमें एक घमंडी जेसुइट को दिल की बीमारी होती है और उसे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले वह भगवान से पूछता है, “भगवन, क्या मेरी अंतिम घड़ी आ गई?” भगवान जवाब देते हैं, “नहीं, तुम कम से कम 40 साल और जिओगे।” ऑपरेशन के बाद वह सोचता है कि अब तो खूब सुधार कराना चाहिए, और वह हेयर ट्रांसप्लांट, फेस-लिफ्ट, लिपोसक्शन, भौहें, दाँत – सब करवा लेता है। यानी, वह पूरी तरह बदल जाता है। जैसे ही वह अस्पताल से बाहर निकलता है, एक कार उसे टक्कर मार देती है और वह मर जाता है। जब वह भगवान के सामने पहुँचता है, तो शिकायत करता है, “भगवन, आपने तो कहा था कि मैं 40 साल और जिऊँगा!” भगवान कहते हैं, “अरे, माफ करना! मैं तुम्हें पहचान नहीं पाया।”
और मुझे एक चुटकुला सुनाया गया जो सीधे मुझसे जुड़ा है — अमेरिका में पोप फ्रांसिस वाला। वह कुछ यूँ है: जब पोप फ्रांसिस न्यू यॉर्क के हवाई अड्डे पर अमेरिका की प्रेरणादायक यात्रा के लिए पहुँचते हैं, तो वहाँ उनके लिए एक विशाल लिमोज़िन खड़ी होती है। वह इतनी भव्यता देखकर थोड़े झिझकते हैं, लेकिन फिर सोचते हैं कि उन्हें बहुत समय से गाड़ी चलाने का मौका नहीं मिला है, और ऐसी गाड़ी तो कभी चलाई ही नहीं। वह सोचते हैं: “चलो, अब नहीं तो फिर कब?” वह ड्राइवर से कहते हैं, “क्या तुम मुझे इसे चलाने नहीं दोगे?” ड्राइवर कहता है, “माफ कीजिएगा, पवित्र महोदय, लेकिन मैं नहीं दे सकता, नियम-कानून हैं।”
लेकिन आप जानते हैं, जब पोप के मन में कोई बात आ जाए तो वह मानते नहीं हैं — यानी, वह ज़िद करते हैं, जब तक ड्राइवर मान नहीं जाता। तो पोप फ्रांसिस स्टीयरिंग व्हील पर बैठते हैं, एक बड़े हाईवे पर, और गाड़ी चलाना शुरू करते हैं। स्पीड बढ़ाते हैं: 50 मील प्रति घंटा, 80, फिर 120... तभी उन्हें सायरन सुनाई देता है और एक पुलिस कार उन्हें रोक लेती है। एक युवा पुलिसकर्मी काली खिड़की के पास आता है। पोप थोड़े घबराते हुए खिड़की नीचे करते हैं, और पुलिसवाला जब पॉप को देखता है तो उनका चेहरा फीका पड़ जाता है। वह कहता है, “एक मिनट माफ कीजिए,” और अपने वाहन में जाकर हेडक्वार्टर फोन करता है: “बॉस, मुझे लगता है कि मुझे एक बड़ी दिक्कत हो गई है।”
“कौन सी दिक्कत?” प्रमुख पूछता है।
“मैंने गाड़ी को तेज़ रफ्तार के लिए रोका है, लेकिन उसमें एक बहुत ही अहम आदमी बैठा है।”
“कितना खास? क्या वह मेयर है?”
“नहीं बॉस, मेयर से भी ज़्यादा।”
“और मेयर से ऊपर कौन? गवर्नर?”
“नहीं, उससे भी ऊपर।”
“क्या वह राष्ट्रपति है?”
“शायद उससे भी ऊपर।”
“और राष्ट्रपति से भी ऊपर कौन हो सकता है?”
“देखिए बॉस, मुझे नहीं पता वह कौन है, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि उसकी कार खुद पोप ड्राइव कर रहे हैं!”
ईसाई धर्म हमें अपनी मुक्ति के लिए छोटे बच्चों के जैसे बनने को कहता है (मत्ती 18:3), हमें उनकी मुस्कुराने की क्षमता को वापस पाने की याद दिलाता है।
आज, मुझे बच्चों से मिलने जितनी खुशी और कोई चीज़ नहीं देती। जब मैं बच्चा था, तो मेरे पास मुस्कान सिखाने वाले लोग थे, लेकिन अब जब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, तो बच्चे ही अक्सर मेरे गुरु बन जाते हैं। उनसे मिलने के पल मुझे सबसे ज़्यादा उत्साहित करते हैं, सबसे अच्छा महसूस कराते हैं।
और फिर बूढ़े लोगों से मुलाकातें, वे बुज़ुर्ग जो जीवन को आशीर्वाद देते हैं, जो सारे ग़ुस्से और शिकायतें छोड़ चुके हैं, जो वर्षों बाद अच्छी बनी हुई "जीवन की शराब" का आनंद लेते हैं — वे बहुत आकर्षक होते हैं। उनमें बच्चों की तरह हँसी और आँसू दोनों का तोहफ़ा होता है।
जब मैं सेंट पीटर्स स्क्वायर में मुलाकातों के दौरान बच्चों को गोद में लेता हूँ, तो ज़्यादातर बच्चे मुस्कुराते हैं; लेकिन कुछ जब मुझे सफेद कपड़ों में देखते हैं, तो सोचते हैं मैं डॉक्टर हूँ जो उन्हें टीका लगाने आया है — और फिर वे रोने लगते हैं।
वे सहजता और मानवता के उदाहरण हैं, और वे हमें याद दिलाते हैं कि जो अपनी मानवता छोड़ देते हैं, वे सब कुछ खो देते हैं। और जब हमें दिल से रोना या पूरे दिल से हँसना मुश्किल हो जाए, तब समझो हम गिरावट की ओर बढ़ रहे हैं। हम सुन्न हो जाते हैं, और ऐसे सुन्न हो चुके वयस्क न अपने लिए अच्छे होते हैं, न समाज के लिए, और न ही चर्च के लिए।
मनन के लिए मूल प्रश्न
1- आप इस विचार को कैसे देखते हैं कि हास्य और व्यंग्य आत्ममोह को हराने और जीवन की अनिवार्य उदासियों के बीच मनोबल उठाने में शक्तिशाली सहयोगी हो सकते हैं?
2- क्या आप कोई ऐसा व्यक्तिगत अनुभव साझा कर सकते हैं, जब किसी बच्चे की मासूमियत या सहजता ने आपको खुशी या मानवता के बारे में कोई मूल्यवान बात सिखाई हो?
3- जब आप वयस्क जीवन की गंभीरता और जिम्मेदारियों का सामना कर रहे होते हैं, तो हल्के-फुल्केपन और आत्म-व्यंग्य की आदत बनाए रखने में आपको क्या मदद करता है?
Seed Questions for Reflection
What do you make of the notion that humor and irony can be powerful allies in overcoming narcissism and lifting the spirit amidst life's inevitable sadnesses? Can you share a personal story that highlights a moment when the innocence or spontaneity of a child taught you something valuable about joy or humanity? What helps you cultivate a habit of light-heartedness and self-irony, particularly in moments when you find yourself facing the seriousness and responsibilities of adult life?