
मुझे अधपका मत छोड़ो ओमिद सफ़ी द्वारा
एक स्त्री आग के पास खड़ी थी। वह सूखे, कठोर चने के कुछ दाने पानी में डाल रही थी। जैसे ही पानी उबलना शुरू हुआ, उसका मन विचारों में डूब गया। अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी: "मैं जल रहा हूँ!"
वह विचारों से बाहर आई और चारों ओर देखा, लेकिन कोई नज़र नहीं आया, इसलिए वह फिर से विचारों में खो गई। फिर वही आवाज़ सुनाई दी: "मैं जल रहा हूँ!"
इस बार उसने ध्यान से देखा तो समझ आया कि वह आवाज़ उबलते पानी के बर्तन से आ रही थी। और जब उसने और अधिक ध्यान से देखा, तो पाया कि वह आवाज़ एक चने के दाने से आ रही थी। वह छोटा सा दाना उबलते पानी में तैरते-तैरते स्त्री से विनती करने लगा: "मैं जल रहा हूँ, मुझे बाहर निकालो!" स्त्री ने करुणा भरी दृष्टि से चने के दाने को देखा। वह उबलते पानी में ऊपर-नीचे हो रहा था। आग इतनी तेज़ थी कि पानी खौल रहा था। यह कैसी आग थी , जो पानी को भी उबाल दे?
चने ने फिर से औरत से विनती की: “मुझे यहाँ से निकालो!” उसने हाथ बढ़ाया, और एक करछी उठाई। उसने पानी में डाली। और चने को वापस उबलते पानी में धकेल दिया। चना करछी के चारों ओर तैरता रहा, और फिर सतह पर आ गया। “क्या तुमने मुझे नहीं सुना? यहाँ बहुत उबल रहा है। मुझे. बाहर. नि कालो!” औरत ने प्यार से चने की ओर देखा। उसने कहा: “मेरे प्यारे चने, मैं तुम्हें वापस इसलिए डाल रही हूँ, क्योंकि तुम अभी पके नहीं हो। तुम अभी भी सख़्त हो। तुम्हें अन्दर लेने लायास्क बनने से पहले पकना होगा।”
जैसा कि रूमी कहते हैं: यदि तुम इस जगह को एक पूर्णता पाने के लिए छोड़ दोगे तभी तुम एक निवाला बनोगे और फिर पुनर्जीवित होगे। हम सब ऐसे ही हैं, सख़्त दिल, नरम होने की प्रक्रिया में, पक रहे हैं। पूरा जीवन ऐसा ही है: प्रेम की आग में पकना, सख़्ती से नरमी की ओर जाना, कच्चेपन से आध्यात्मिक रूप से “पके” होना। एक परिवर्तन है जिससे हममें से प्रत्येक को “पकने” से पहले गुज़रना होगा।
रूमी ने स्वयं अपने जीवन को इस प्रकार संक्षेप में कहा: मेरे पूरे जीवन का इन तीन वाक्यांशों में सार है: मैं कच्चा हुआ करता था। फिर मैं पका। अब, मैं दहक रहा हूँ।
हममें से अधिकांश केवल कच्चे से पके होने पर ही संतुष्ट हो जाएँगे। कुछ चुने हुए लोगों के लिए, जो न केवल मुक्ति बल्कि पवित्रीकरण भी चाहते हैं, लक्ष्य वास्तव में आग बनना है। इस तरह, जो कोई भी उनके दायरे में आता है, वह कच्चे से पका हुआ बन सकता है। यह एक प्रकार की अग्नि है|
ये अग्नि है दैविक प्रेम ( इश्क़) की | यह प्रेम सिर्फ एक भावना अथवा भावनात्मक विचार नहीं है | यह खुदा के बन्दे को इस संसार के अन्दर उन्मुक्त किये जाने से कम नहीं है |
एक अन्य कविता में रूमी अपने प्रेमी खुदा से गुहार लगाता है , अपने shams ( एक इस्लामी ज्ञानी व्यक्ति) से गुहार लगाता है, और उससे भी गुहार लगाता है जो उसे ही अग्नि में पका रहा होता है : मुझे अधपका ना छोड़ो |
हम कितनी बार ,अंत में, सिर्फ इस तरह के रह जाते हैं | जैसे , हमें वह प्रेम की अग्नि मिल जाती है , जो हमें पका देती है , वह अग्नि जो हमें अन्दर से परिवर्तित कर देती है | हम पकने लग जाते हैं , परिपक्व होने लग जाते हैं, मुलायम होने लग जाते हैं, एवं इंसानों के रूप में तैयार होने लग जाते हैं, और उसके पश्चात , अंत में ,उस प्रेम से फिर मूंह मोड़ लेते हैं |
अपने आपको पका दिया जाना कठिन है, अपने “कच्चे” पन को हटा देना दर्दनाक है | हमारा अहम् प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता और वो भीख मांगता है, गुहार लगता है , उस अग्नि से बाहर निकाल दिए जाने के लिए| अतः हम अधपके, अधभुने ही रह जाते हैं , जिसे हम कह सकते हैं, “ अध कच्चे |और इस दशा में , किसी अन्य इंसान द्वारा अपने ह्रदय में हमें लिए जाने से सभी को अपाचन हो जाता है |
हम स्वयं ही वह चने हैं, हम स्वयं ही वह प्रेम की अग्नि हैं और हम स्वयं ही वह सूफी प्रेमी /वह पकाने वाली हैं, जो हमें बराबर अग्नि की लपटों में वापस धकेलते रहती है |
काश हमारे पास वो हृदय हो, काश हमारे पास वो साहस हो उस अग्नि के पकाने को सहन करने का ( साहस होना ह्रदय होने का ही मूल शब्द है) | काश हमारे पास वो साहस हो उस अग्नि में पकाए जाने के लिए अपने आप को समर्पित करने का| काश हमारे पास वो ह्रदय हो उस पकाने को पूरा सहने का , वह ह्रदय हो, जिससे हम सब अपने आपको इस लायक बना सकें , ताकि हम साथ वाले अन्य इंसानों के ह्रदय में वास कर सकें|
यह कैसा फर्क है पूरा पक जाने एवं अधपका रह जाने के बीच | यहऔर यह कितना मधुर होगा , उस प्रेमिका का मिल जाना , जो हमें प्रेम के उबलते पानी में वापस धकेल सकती है | जो हमारे पकने को पूर्ण करा सकती है | ओह वो सूफी पकाने वाली , वो जिसके पास उस प्रेम की अग्नि का उपहार है , मेरी एक ही प्रार्थना है “ मुझे छोड़ मत देना”|
मनन के लिए मूल प्रश्न: आप इस धारणा से कैसा सम्बन्ध रखते हैं कि हम ही वह चनेहैं, हम ही वह अग्नि हैं, हम ही वह सूफी पकाने वाली हैं, जो हमें उस उबलते पानी में वापस धकेल देती है ? क्या आप उस समय की निजी कहानी साझा कर सकते हैं , जब आपने अपने आपको पूरी तरह पक जाने के लिए समर्पित किया था? आपको, वो प्रक्रिया जो आपको मुलायम बना देगी और वो प्रक्रिया जो आपको कठोर बना देगी , के बीच में अंतर देखने के लिए किस बात से मदद मिलती है