आप जो हैं वह एक पूर्ण अपूर्णता है” - एम्मानुएल के द्वारा
आपके कम विकसित क्षेत्रों को बने रहने का हक़ है|
वे अतीत की बातें फुसफुसाते हैं।
वे फुसफुसाते हैं , भ्रम को , अतृप्तता को.
और ईश्वर से अलग हुई अपनी आत्मा की पीड़ा कि ,
फिर से उस एकत्व की चाहत को |
यह मान लें कि इस पृथ्वी पर केवल
सापेक्ष पूर्णता ही हो सकती है।
यह भी मान लें कि प्यार पाने के लिए
आपको परिपूर्ण होने की जरूरत नहीं है|
अपनी अपूर्णताओं में एक दुसरे से प्रेम करें,
कोमलता से एवं पूर्ण रूप से | अपने आप के प्रति विनम्र बनें|
भौतिक स्तर पर पूर्णता की मांग
आपकी सबसे बड़ी दुश्मन हो सकती है |
पूर्णता पर अड़े रहना विकास में बाधा बनता है।
अपूर्णता को अपनी मानवता के हिस्से
के रूप में स्वीकार करना, विकास है|
यदि आप अपने उस हिस्से से प्यार कर सकते हैं
जिसे आप अपूर्ण मानते हैं,
तभी आतंरिक रूपांतरण शुरू हो सकता है।
जब आप इसका न्यायीकरण करके
इसे अपने दिल से बाहर निकाल देते हैं
तब यह एक कठोर खोल बन जाता है
जिससे प्रकाश अवरुद्ध हो जाता है।
यदि आप इन्कार करते हैं तो आपका व्यक्तित्व क्या बन जाता है?
आप उस इनकार से गहराई से जुड़ जाते हैं।
जब आप जो भी हैं , उसे ही उसकी सच्चाई में स्वीकार करते हैं,
तब आप मुक्त हो जाते हैं।
अस्वीकृति से कोई मुक्त नहीं होता।
प्रेम से ही मुक्ति मिलती है।
प्रकाश तक पहुँचाने का प्रयास ,
एक सुंदर आह्वान है,
परन्तु आप प्रकाश को तब तक नहीं पा सकते
जब तक कि आप अंधेरे को स्वीकार नहीं करते।
आत्माएं जो पूर्ण मन से प्रयास करती हैं
वे पूर्णता के इतने करीब हैं
जितना कोई मनुष्य रुपी हो सकता है।
आप कौन हैं यह जानना एक आवश्यक कदम है
वह बनने के लिए जो आप बनना चाहते हैं,
और ऐसा ही होता रहता है
अनंत काल तक |
अपनी अपूर्णता के साथ सहज रहें,
लेकिन उसके प्रति उदासीन न हो जाएँ|
पूर्णता की मांग कौन करता है?
सिर्फ वो आत्मायें जो मनुष्य रूप में कैद हैं ,
और जो यह मानती हैं कि पूर्णता ही आवश्यक है।
ऐसा नहीं है। आवश्यकता है सच्चाई की,
एक खुले दिल की|
यह ही वो पूर्णता है जिसकी मांग है-
एक परिपूर्ण तृष्णा |
ब्रह्मांड की पूर्णता
एक व्यापक वास्तविकता है
आपके मनुष्य रुपी जगत के चारों ओर
घिरी अपूर्णता के|
मनन के लिए मूल प्रश्न: आप इस धारणा को कैसा मानते हैं कि पूर्णता पर अड़े रहना अंदरूनी विकास में बाधा बनता है? क्या आप उस समय की कोई ऐसी निजी कहानी साझा कर सकते जब आपने वास्तव में जो था उसे स्वीकार करने के बाद ही मुक्ति महसूस की हो? अपनी अपूर्णता के प्रति सहज रहने में, लेकिन उसके प्रति उदासीन न होने में, आपको क्या चीज मदद करती है ?
From "Emmanuel's Book," Introduction by Ram Dass, Compiled by Pat Rodegast and Judith Stanton
Seed Questions for Reflection
How do you relate to the notion that insistence on perfection precludes growth? Can you share a personal story of a time you felt a release after accepting what was truly there? What helps you be comfortable but not complacent with your imperfections?