हवाईअड्डा बन जाना
दुनिया भर की यात्राओं के दौरान अनगिनत हवाईअड्डों और टर्मिनलों से गुजरने के बाद, मैंने हाल ही में अपने अनुभवों पर ठहरकर विचार किया। विशेषकर इस बात पर कि ये विशाल संरचनाएँ हमें किस प्रकार आकार देती हैं, हमें अनुशासित करती हैं, और अपने ढाँचे का हिस्सा बना लेती हैं।
ज़रा सोचिए—हवाईअड्डे हमारे शरीरों को किस तरह व्यवस्थित करते हैं। बैरियर और कतारों की रस्सियाँ हमें अजीब-सी ज़िगज़ैग चाल में चलने को बाध्य करती हैं। हमें ऐसे विशेष ढंग से खड़ा होना पड़ता है, ताकि यह साबित हो सके कि हम भरोसेमंद हैं। हमारे शरीरों की जाँच होती है—वे स्कैन किए जाते हैं, एक्स-रे से भेदे जाते हैं, पहचान लिए जाते हैं, समझे जाने योग्य बनाए जाते हैं और मानो बदल दिए जाते हैं। फिर हमें उन स्क्रीन के सामने प्रस्तुत किया जाता है जो या तो हमें आगे बढ़ने की अनुमति देती हैं, या हमें संदेहास्पद घोषित कर देती हैं। और आव्रजन (इमिग्रेशन) की लंबी परीक्षा के बाद ही हमारे भीतर विलासिता की वस्तुओं को खरीदने की इच्छाएँ जगाई जाती हैं।
एक अर्थ में, हम केवल हवाईअड्डे से होकर नहीं गुजरते; हम स्वयं हवाईअड्डा बन जाते हैं।
हवाईअड्डे केवल यात्रियों को नहीं सँभालते; वे हमारे अनुभव और हमारे शरीरों को भी गढ़ते हैं। जो लोग यात्रा करते हैं, वे उसकी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं—मानो उसके फर्नीचर का एक अंश। हम ऐसे “हवाईअड्डा-शरीर” बन जाते हैं जो एक ऐसे तंत्र का हिस्सा हैं, जहाँ सुरक्षा सर्वोच्च मूल्य बन जाती है और जहाँ पहुँच के अक्सर जाति, नस्ल, राष्ट्रीयता या पहचान के आधार पर अलग-अलग अनुभव किए जाते हैं।
धीरे-धीरे हम उस व्यवस्था की भाषा सीख लेते हैं। हम कतार में लगकर संतोष अनुभव करते हैं, और यदि कोई बीच में आने की कोशिश करे तो विनम्रता से कहते हैं—“कतार है।” हम संकेतों, प्रतीकों, अक्षरों और गेट 54B की ओर इशारा करते तीरों को सहज ही समझने लगते हैं। चमकदार फर्श, अलग-अलग भाषाओं में टिमटिमाती “बोर्डिंग” की सूचनाएँ—ये सब हमारी इंद्रियों को प्रशिक्षित करते हैं। और जब अंततः हम प्रस्थान-द्वार पार कर लेते हैं, तो अनायास ही एक गहरी साँस निकलती है—मानो दीक्षा पूरी हो गई हो। अब हम उस धातु के पक्षी में अपनी सीट ग्रहण कर सकते हैं, जो समय और दूरी को मोड़ देता है। हम उसकी यात्रा का एक छोटा-सा जैविक हिस्सा बन जाते हैं।
यह सोचने की बात है कि हवाईअड्डे—भले ही यात्रियों के लिए अस्थायी स्थान हों—हमें और किन-किन तरीकों से गढ़ते, बदलते और हमारे भीतर काम करते हैं। क्या “हवाईअड्डा-मानव” होने से दुनिया को जानने के कुछ ऐसे तरीके संभव हो जाते हैं जो अन्य प्रकार के जीवन-अनुभवों में संभव नहीं?
और शायद इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम और किन-किन अदृश्य व्यवस्थाओं का पहले से ही हिस्सा हैं? किन बड़े राजनीतिक, सामाजिक, पारिस्थितिक या प्राकृतिक तंत्रों के भीतर हम स्वयं अनजाने में “फर्नीचर” की तरह अपना स्थान निभा रहे हैं? जब हमारी पहचान हमेशा बदलती रहती है—संबंधों में बनती-बिगड़ती रहती है, कभी पूरी तरह स्थिर नहीं होती—तब “आप कौन हैं?” जैसे प्रश्न का उत्तर हम कैसे दें?
मनन के लिए मूल प्रश्न -
Excerpted from here.
How do you relate to the notion that "one does not go 'through' the airport; one BECOMES the airport"? Can you share a personal story of a moment when you noticed a larger structure - an institution, a routine, a social arrangement - quietly working on you, bending your posture or your desires in ways you only recognized later? What helps you develop an awareness of the "larger assemblages" you are already a part of?