आईये , हम एक प्रश्न रखें , अरुण धुन्धाले
क्या हम असलियत में उन सब को समझते हैं, जिसे हमने अपने हाथों में पकड़ रखा है |
हम समय के उन अनमोल क्षणों को थामे रखना चाहते हैं— प्रकाश और छाया के वे पल, जिसे हमने मानो तस्वीर में कैद कर रखा है ।
ताकि हम उन्हें इश्वर के आशीर्वाद मानते हुए उन तस्वीरों में अपनी स्मृतियों में संजो सकें , और जिन्हें हम आसानी से भूल भी जाते हैं।
हम निरंतर जूझते रहते हैं कम आसानी से भुलाए जाने जीवन के अभिशापों से |
और अपनी जिम्मेदारियों को सँभालते हैं, सम्मानपूर्वक ।
मैं भी उसी को छूने का प्रयास करता हूँ—यद्यपि हम एक-दूसरे से बहुत दूर हैं और कभी मिले भी नहीं।
लेकिन जब आप और मैं अपने-अपने पारिवारिक एल्बम खोलकर देखते हैं, तो पाते हैं कि हमारे बीच जितनी समानताएँ हैं, शायद हमने कभी सोचा भी न था।
हम अपने हाथों में , हमारे परिवारों एवं समुदायों का इतिहास रखते है— अद्वितीय, फिर भी एक-दूसरे से बहुत अलग नहीं।
हमारे कस्बों की कहानियाँ, और हमारे पैरों तले उन धरती के दृश्यों की कहानियां , जो हमारे घरों के सामने हैं,
हमारे जीवन के वे स्थान हैं जिन्हें हमने जीवन में विशिष्ट बनाया,
और जिन्होंने बदले में हमारे भीतर अच्छाई और सुंदरता को पहचानने की दृष्टि गढ़ी।
और हमारे व्यक्तिगत स्थानों की कहानियाँ, जो हमें सिखाती हैं कि इस संसार में "घर में होने " का अर्थ क्या है।
हमारे हाथों में , इस पृथ्वी पर ,केवल हमारा वर्तमान नहीं, हमारे बच्चों और उनके बच्चों का भविष्य भी है।
विशेषकर उन बच्चों का, जो अपनी इच्छा से या घर के नियमों के कारण,
अब शहरों और उपनगरों के खुले, अनगढ़ किनारों पर ,स्वच्छंद होकर खेलने की स्वतंत्रता नहीं जानते।
उनके लिए—और हमारे लिए भी—यह एक संकट है कि अब उन्हें बिजली के यंत्रों से , थोड़ी ही, दूर चल रहे जीवन के अद्भुत नाटक में, बहुत कम रुचि रह गई है।
भविष्य के कल के स्वरूप से कुछ कम नहीं जिसे हमने अपने अनिश्चित हाथों में पकड रखा है,
यह अनिश्चितता , की क्या करना सब से अच्छा है,
फिर भी हमारा संकल्प यही है कि जिनके लिए हम यह पृथ्वी विरासत में छोड़कर जाएँगे, उनके लिए सर्वोत्तम करने का प्रयास कभी कम न हो।
कवि विलियम ब्लेक का कहना है ,की “ असीमता हमने हाथों में पकड़ी हुई है, और अनंतकाल को एक एक घंटे में पकड़ रखा है,” |
दुनिया को देखने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं। यहीं, अपने आसपास, हमें एक सार्वभौमिक पुकार सुनाई देती है—कि हम और अधिक गहराई से सोचें,
उन बातों के बारे में जिन्हें हम जानते हैं,और जिनके बारे में हमें परवाह है|
हमारा आज , हमारा वर्तमान, हमारी इंद्रियों की संपदा, स्मृतियों और रिश्तों की सम्पदा ।
आइए, हम एक-दूसरे की देखभाल गहराई और निरंतरता के साथ करें।
उस अमूल्य प्राकृतिक संसार का उत्सव मनाएँ और उसकी रक्षा करें,
जो हमारा स्वामित्व नहीं है, किन्तु जिसका भविष्य हमारे हाथों में है,
और जिससे अंततः हमारा वर्तमान जीवन और आने वाला भविष्य ,जन्म लेता है।
मनन के लिए बीज प्रश्न: आप इस धारणा से कैसा नाता रखते हैं की "हम अपनी हथेली में अनंत को थामे हुए हैं “, उन स्थानों एवं रिश्तों के माध्यम से जो हमारे नित्य के “ घर में होने “ एवं अपनेपन के एहसास को आकृति देती हैं ? क्या आप अपने जीवन की कोई ऐसी निजी घटना साझा कर सकते हैं, जब आपने प्रकृति और अपने आसपास के लोगों की गहराई और निरंतरता से देखभाल की हो—विशेषकर तब, जब आपको स्वयं यह स्पष्ट न रहा हो कि सबसे सही कदम क्या है? किस कार्य को करने से , आपको आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के अभ्यास में मदद मिलती है?
Arun works on establishing bio-insulation production from agri-residues in South Asia. He is an educator and seeker -- in his words, "Seeking, with each dawn, gentle ways forward for our tiny blue dot."
How do you relate to the notion that we "hold infinity in the palm of our hand" through the particular places and relationships that shape our everyday sense of home and belonging? Can you share a personal story of a time you cared for the natural world and the people around you "in profound and persistent ways," especially when you felt uncertain about how to do what's best? What helps you practice responsibility toward future generations with your actions?