A Recipe Is A Story


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**एक रेसिपी एक कहानी है
⁃ प्रिया बेसिल के द्वारा

अंग्रेज़ी में “cook something up” के दो अर्थ होते हैं: एक, सचमुच कुछ पकाना; और दूसरा, कोई कहानी या योजना गढ़ लेना, यानी कल्पना से कुछ रच देना। जब मैंने लिखना शुरू किया, तो मैं बहुत बेकिंग भी करती थी, खासकर उन दिनों जब लिखना ठीक से नहीं हो रहा होता था। उपन्यास की धीमी और अदृश्य रचना के साथ-साथ कुछ ऐसा बनाना, जो जल्दी तैयार हो जाए और खाया जा सके, मुझे सुकून देता था।

एक केक तुरंत मिलने वाली सरल संतुष्टि देता है और दूसरों की सराहना भी जल्दी मिल जाती है, जबकि लेखन – अपने सारे सुखों के बावजूद – हमेशा आत्म-संदेह के साथ आता है। इसके अलावा, दूसरों की प्रतिक्रियाएँ, चाहे वे सकारात्मक ही क्यों न हों, मेरे लिए अक्सर पर्याप्त नहीं होतीं। मैं हमेशा किसी अतिरिक्त मान्यता की भूख में रहती हूँ, जिसे इस दुनिया में कोई भी पूरी तरह नहीं दे सकता।

केवल लिखने की प्रक्रिया में ही यह भूख कुछ क्षणों के लिए शांत होती है, क्योंकि उस समय मैं अपने सीमित ‘स्व’ से थोड़ी बड़ी हो जाती हूँ — मानो पूरी दुनिया को अपने भीतर जगह दे सकूँ, और फिर भी हर व्यक्ति के साथ ऐसे जुड़ सकूँ जैसे वह मेरा एकमात्र अतिथि हो। यह अनुभव मेरी उस गहरी, लगभग अतृप्त भूख को सहलाता और तृप्त करता है — मेरे भीतर की उस इच्छा को, जिसमें मैं होना भी चाहती हूँ और सब कुछ पाना भी।

कहानियाँ आपसी आतिथ्य का एक रूप रचती हैं। आखिर कहानी क्या है, अगर ठहरने का एक निमंत्रण नहीं? आपको भीतर बुलाया जाता है, लेकिन उसी क्षण आपको भी कहानी को अपने भीतर स्थान देना होता है — पूरे ध्यान के साथ।

चाहे आप किसी किताब से कहानी पढ़ रहे हों या किसी व्यक्ति से सुन रहे हों, सच में समझने के लिए गहराई से सुनना आवश्यक है। पूरा ध्यान देना मानो एक मौन सम्मान देना है। कहानी और श्रोता एक-दूसरे के लिए खुलते हैं, एक-दूसरे में फैलते हैं और एक-दूसरे को अपने भीतर थाम लेते हैं।

एक रेसिपी ऐसी कहानी है जिसे सच में चुराया नहीं जा सकता। यदि आप अलग-अलग कुकबुक्स देखें, तो कई रेसिपियाँ लगभग एक जैसी मिलेंगी, जिनमें फर्क सिर्फ मात्रा के छोटे बदलाव या विधि में हल्की-सी भिन्नता का होता है।

फिर भी, इस उधार को खुशी-खुशी स्वीकार किया जाता है — कभी नाम में ही, जैसे “जूलिया की एप्पल टार्ट”, या किसी उप-पंक्ति में, जैसे “योतम ओटोलेंघी से अनुकूलित”।

रेसिपियाँ लोगों और संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान का सबसे सहज और उदार माध्यम हैं — खासकर आज के समय में, जब फूड ब्लॉग्स हर जगह उपलब्ध हैं और जो सामग्री कभी विदेशी लगती थी, वह अब हमारे आसपास के बाज़ार में भी आसानी से मिल जाती है।

रेसिपियाँ अपने आप में “ओपन सोर्स” की तरह हैं — वे ऐसे आधार देती हैं जिन्हें समय, स्थान और मौसम के अनुसार बदलकर अनगिनत व्यंजन बनाए जा सकते हैं।

आपको बस एक बार किसी रेसिपी को सफलतापूर्वक बना लेना होता है, और वह आपको अपनी लगने लगती है। उसे कुछ बार और दोहराएँ, और वही चीज़ धीरे-धीरे परंपरा बन जाती है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अलग-अलग समाज एक ही भोजन को अपनी पहचान के रूप में दावा करते हैं। मध्य-पूर्व में हुमस इसका एक प्रसिद्ध और विवादित उदाहरण है।

इस लोकप्रिय चने के व्यंजन की असली उत्पत्ति को लेकर चलने वाली अंतहीन बहसों से तंग आकर, लेबनान के कुछ लोगों ने इसे एक बार में सुलझाने का प्रयास किया। उन्होंने अब तक का सबसे बड़ा हुमस बनाकर रिकॉर्ड बनाया, इस आशा में कि यह उपलब्धि हुमस को विशेष रूप से लेबनान से जोड़ देगी।

इतनी अधिक मात्रा बनाकर अपनी पहचान स्थापित करने का यह विचार अरबों की प्रसिद्ध उदार आतिथ्य परंपरा के अनुरूप है — जिसे अक्सर मज़ाक में इस चेतावनी में कहा जाता है: किसी अरब घर में खाने से पहले और बाद में दो-दो दिन का उपवास करना पड़ेगा।

अधिकांश रसोइयों के लिए यह पूछा जाना कि आपने यह कैसे बनाया, सबसे बड़ा सम्मान होता है। इस तरह आगे बढ़ाई गई रेसिपियाँ अपने पिछले रूपों की यादों में भीगी होती हैं।

रेसिपियाँ एक साथ निरंतरता भी हैं और परिवर्तन भी। कभी उन्हें वैसे ही निभाया जाता है, कभी बदला जाता है, कभी वे खो जाती हैं, और कभी फिर से मिलती हैं… वे व्यक्तिगत या सामूहिक हार और जीत की कहानियाँ भी अपने भीतर लिए होती हैं।

इस अर्थ में बहुत कम चीज़ें पूरी तरह “प्रामाणिक” होती हैं — हर चीज़ किसी न किसी व्यक्ति या स्थान से प्रभावित होती है। यह बात भोजन के लिए भी उतनी ही सच है जितनी पूरी संस्कृति के लिए।

“प्रामाणिकता” की खोज अक्सर “अधिकार” जताने की एक कोशिश बन जाती है — जिसमें दूसरों को बाहर करना, अलग करना और चीज़ों को सीमित करना शामिल होता है। और यह आतिथ्य के बिल्कुल विपरीत है।

अगर मैं आतिथ्य को चित्रित करूँ, तो वह हम में से हर एक से बाहर की ओर फैलते हुए अनगिनत सर्कल्स की एक श्रृंखला जैसा होगा।
इन सर्कल्स का एक-दूसरे को काटना, एक-दूसरे में घुलना और दूर तक फैलना — शायद हमारे समय का एक महत्वपूर्ण पैटर्न दिखाता है। ऐसा पैटर्न जो, जैसे नक्शे की रेखाएँ ज़मीन की ऊँचाई-नीचाई दिखाती हैं, वैसे ही समाज की असली बनावट को सामने लाता है — जहाँ हम एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं, कितना खुलकर देते हैं, और देने-लेने का संतुलन कैसा है।
फिर भी, ये सर्कल्स चाहे जितने भी फैल जाएँ, बिना शर्त आतिथ्य उनकी सबसे बाहरी सीमा से भी आगे रहता है।
वह ज़्यादातर एक अनजानी जगह में होता है — मानो नक्शे के बाहर।

मनन के लिए मूल प्रश्न (Seed Questions)

1. आप इस विचार से कैसे जुड़ते हैं कि “प्रामाणिकता की खोज अक्सर अधिकार जताने की कोशिश बन जाती है”?
और इसके विपरीत, सच्चा आतिथ्य खुलापन, एक-दूसरे में घुलना और निरंतर आदान-प्रदान की ओर ले जाता है — इस बात को आप अपने अनुभव में कैसे देखते हैं?
2. क्या आप कोई ऐसा व्यक्तिगत अनुभव साझा कर सकते हैं, जब किसी रेसिपी, भोजन या किसी रचनात्मक चीज़ को साझा करने से आपके और किसी और के बीच एक अनदेखा जुड़ाव बना हो?
ऐसा कोई क्षण, जिसमें देने और लेने का एक सुंदर संतुलन उभरकर सामने आया हो?
3. क्या ऐसी कोई चीज़ है जो आपको अपने आतिथ्य के सर्कल को थोड़ा और फैलाने में मदद करती है —
खासकर तब, जब बिना शर्त स्वागत करना थोड़ा अनजान या असहज-सा लगता हो?
 

Excerpted from Priya Basil's book -- Be My Guest: Reflections on Food, Community and the Meaning of Generosity


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