The Revolutionary Educator


Image of the Weekक्रांतिकारी शिक्षक
— पाउलो फ्रेरे के द्वारा

वर्णन की यह शैली, जिसमें शिक्षक कथावाचक होता है, छात्रों को केवल उस कही गई बात को यांत्रिक रूप से याद करने की ओर ले जाती है।और इससे भी बुरा यह है कि यह उन्हें “पात्र” बना देती है — ऐसे बर्तन जिन्हें शिक्षक द्वारा “भरा” जाना है।जितना अधिक शिक्षक इन पात्रों को भरता है, उतना ही वह “अच्छा” शिक्षक माना जाता है।और जितनी विनम्रता से ये पात्र स्वयं को भरने देते हैं, उतने ही वे “अच्छे” छात्र माने जाते हैं।

इस प्रकार शिक्षा एक जमा करने (deposit) की क्रिया बन जाती है, जिसमें छात्र जमा रखने के स्थान (depositories) होते हैं और शिक्षक जमा करने वाला (depositor)।संवाद करने के बजाय, शिक्षक केवल सूचनाएँ देता है और उन्हें जमा करता है, जिन्हें छात्र धैर्यपूर्वक ग्रहण करते हैं, याद करते हैं और दोहराते हैं।इसे ही शिक्षा का “बैंकिंग मॉडल” कहा जाता है, जिसमें छात्रों की भूमिका केवल प्राप्त करने, संग्रह करने और जमा रखने तक सीमित रहती है।सच है कि वे उन चीज़ों के संग्रहकर्ता या सूचीकार बन सकते हैं जिन्हें वे जमा करते हैं।लेकिन अंततः, इस व्यवस्था में रचनात्मकता, परिवर्तन और सच्चे ज्ञान के अभाव के कारण, लोग स्वयं ही एक तरह से “संग्रहित” हो जाते हैं।क्योंकि प्रश्न और खोज के बिना, और अनुभव व क्रिया (praxis) के बिना, मनुष्य वास्तव में मनुष्य नहीं बन सकता।ज्ञान केवल आविष्कार और पुनः-आविष्कार से जन्म लेता है — उस बेचैन, अधीर, निरंतर और आशावान खोज से, जिसे मनुष्य दुनिया में, दुनिया के साथ और एक-दूसरे के साथ करता है।

इस “बैंकिंग” मॉडल में, ज्ञान उन लोगों द्वारा दिया गया एक उपहार बन जाता है जो स्वयं को ज्ञानी मानते हैं, उन लोगों को जिन्हें वे अज्ञानी समझते हैं।लेकिन शिक्षा की शुरुआत इस विरोधाभास को सुलझाने से हो सकती है — शिक्षक और छात्र के बीच के इस विभाजन को मिटाकर, ताकि दोनों एक साथ शिक्षक भी हों और छात्र भी।

जो लोग इस “बैंकिंग” दृष्टिकोण का उपयोग करते हैं — चाहे जानबूझकर या अनजाने में (क्योंकि कई भले इरादों वाले शिक्षक भी यह नहीं समझ पाते कि वे अनजाने में अमानवीकरण कर रहे हैं) — वे यह नहीं देख पाते कि यह जमा की गई जानकारी स्वयं वास्तविकता के विरोधाभासों से भरी हुई है।लेकिन देर-सबेर, ये विरोधाभास पहले निष्क्रिय रहे छात्रों को अपने इस “पालतू बनाए जाने” और वास्तविकता को भी उसी रूप में ढालने के प्रयास के विरुद्ध खड़े होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।वे अपने अनुभवों के माध्यम से यह जान सकते हैं कि उनका वर्तमान जीवन-तरीका उनके उस आंतरिक आह्वान से मेल नहीं खाता जो उन्हें पूर्ण रूप से मनुष्य बनने की ओर बुलाता है।वे यह भी देख सकते हैं कि वास्तविकता स्थिर नहीं है, बल्कि एक सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है।
यदि मनुष्य खोजी हैं और उनका मूल स्वभाव मानवीयता की ओर बढ़ना है, तो देर-सबेर वे इस विरोधाभास को पहचान लेंगे जिसमें “बैंकिंग शिक्षा” उन्हें बनाए रखना चाहती है, और फिर अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष में उतरेंगे।

लेकिन एक सच्चा मानवीय और क्रांतिकारी शिक्षक इस संभावना के साकार होने का इंतज़ार नहीं करता।
शुरू से ही उसके प्रयास छात्रों के प्रयासों के साथ जुड़े होते हैं — आलोचनात्मक सोच में भाग लेने और पारस्परिक मानवीयता की खोज में।उसके प्रयासों में लोगों और उनकी रचनात्मक शक्ति पर गहरा विश्वास होता है।और इसे संभव बनाने के लिए, शिक्षक को छात्रों के साथ अपने संबंधों में उनका सहभागी बनना पड़ता है।

चिंतन के लिए प्रश्न-
1-“ज्ञान केवल आविष्कार और पुनः-आविष्कार से जन्म लेता है — उस निरंतर, अधीर, आशावान खोज से” — इस विचार को आप कैसे समझते हैं? क्या यह दूसरों से सुनकर और जमा करने से अलग एक जीवंत प्रक्रिया है?
2-क्या आप अपने जीवन का कोई ऐसा अनुभव साझा कर सकते हैं,जब आप एक निष्क्रिय “पात्र” से एक सक्रिय खोजी बने हों?क्या उस प्रक्रिया में आपने अपने ही प्रश्नों के माध्यम से कुछ जाना, बजाय तैयार उत्तरों को स्वीकार करने के?
3-आपको क्या मदद करता है इस निरंतर, आशावान खोज में जुड़े रहने में —दुनिया के साथ और लोगों के साथ?
और क्या चीज़ आपको उस आसान प्रवृत्ति से बचाती है
जहाँ हम बस सुनकर, जमा करके, और खोज बंद कर देते हैं?
 

Excerpted from the book, Pedagogy of the Oppressed.


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