“पेड़ की छाँव में बैठना”
रब्बी एरियल बर्गर के द्वारा —
हम मनुष्यों को अपने अस्तित्व और भविष्य के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझनी है कि “स्व” और “दूसरे” के बीच चुनाव करना असल में एक भ्रम है।दुनिया में अक्सर यह माना जाता है कि यदि आप अपनी पहचान, अपनी परंपरा, अपने धर्म और अपने समुदाय से गहराई से जुड़े हैं —चाहे आप यहूदी हों, ईसाई हों, मुस्लिम हों, हिंदू हों, बौद्ध हों, सिख हों या किसी और धार्मिक-सांस्कृतिक समुदाय से हों —तो आप व्यापक, विश्व-व्यापी मूल्यों से दूर हो जाएँगे।मानो जितना आप अपनी पहचान से जुड़े रहेंगे, उतना ही कम आप पूरी मानवता से जुड़ पाएँगे।
यह सोच कहती है कि एक शांत, सौहार्दपूर्ण समाज बनाने के लिए हमें अपनी पुरानी, गहरी, मजबूत पहचान को “पिघलाना” होगा —अपनी परंपराओं को हल्का कर देना होगा,अपने रिवाज़ों और कहानियों को किनारे कर देना होगा,ताकि एक नई दुनिया बने जिसमें सब लोग एक ही तरह सोचें,जहाँ सभी दीवारें काँच की हों,हर चीज़ पारदर्शी हो,जहाँ किसी भी शब्द, विचार या अनुभव में रहस्य न रहे,क्योंकि सब कुछ पहले से तय और परिभाषित कर दिया गया है।ऐसे समाज में आपको बताया जाएगा कि आपको क्या मानना है, कैसे बोलना है, कौन-सी भाषा कब सही है।और चूँकि हम सब इस व्यवस्था को मौन रूप से स्वीकार कर लेते हैं,तो धीरे-धीरे वही नई “व्यवस्थाएँ” नए धर्म की तरह बन जाती हैं।लेकिन यह तरीका हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों के लिएएक तरह से उल्टा है, विरोधी है।और इससे हम उन गहरे औज़ारों को खो देते हैं , जिनसे हम दुनिया को समझ सकते थे,शांति को अपना सकते थे,और एक पूर्ण मनुष्य बन सकते थे।
उदाहरण के लिए, यदि मैं शांति स्थापित करना चाहता हूँ,तो कुछ लोग कहेंगे कि मैं अपनी यहूदी पहचान को कम कर दूँ,उसे छोटा कर दूँ,इसे मेरी पहचान के “छोटे हिस्से” में डाल दूँ,जैसे कि कहना —"तुम एक Jewish American बनो, न कि American Jew।”लेकिन यदि मैं अपनी पहचान को कमजोर कर दूँ,तो मैं उन कहानियों, उन परंपराओं, उन आध्यात्मिक अभ्यासों से दूर हो जाऊँगा, जिनसे मुझे शांति, स्वतंत्रता और गहराई मिल सकती है।
वास्तव में, मैं एक शांतिप्रिय और मुक्त मनुष्य तब बन सकता हूँ,जब मैं अपनी जड़ों, अपने धर्म, अपने इतिहास और सभी चीज़ों की परस्पर-सम्बद्धता को गहराई से समझूँ।
हम सब में एक बोधिसत्व बनने की क्षमता है —एक ऐसा इंसान जो दूसरों की भलाई के लिए जीता हो।लेकिन यदि आपने जीवन में कभी “पेड़ के नीचे बैठने” का अनुभव नहीं लिया — एक ऐसा अनुभव जिसमें मौन हो, ध्यान हो, गहराई हो,जहाँ आप रोज़मर्रा की दुनिया से निकलकर एक दूसरी दुनिया का स्वाद लेते हों —तो आप उसी संस्कृति से पूरी तरह चलाए जाएँगे जिसमें आप रहते हैं।
आज की दुनिया में हर चीज़ पूँजीवाद और बाज़ार की व्यवस्था में घुलमिल सकती है।यहाँ तक कि आपकी बुद्धि, आपकी समझ, आपका प्रकाश भी एक “वेबिनार” या “वर्कशॉप” में बदला जा सकता है, "सिर्फ 99 डॉलर में”।जब तक आप किसी पेड़ के नीचे नहीं बैठे,जब तक आपने अपने भीतर की शांति का अनुभव नहीं किया,तब तक आप उस व्यवस्था के बाहर खड़े नहीं हो पाएँगे।पेड़ के नीचे बैठने का अर्थ केवल प्रकृति में बैठना नहीं है।यह कोई भी पल हो सकता है जब आप ठहरें, मौन में उतरें,अपनी परंपरा, अपने धर्म, अपनी जड़ों से जुड़ें,कहानियों, गीतों, अनुष्ठानों और उन अनुभवों से मिलेंजो सदियों से मानवता को दिशा देते आए हैं।यह अनुभव हमें एक बड़ी, गहरी दुनिया से जोड़ता है —एक ऐसी दुनिया जिसकी खुशियाँ और आँसू हमारे आज से बहुत पुराने हैं।जहाँ के रिवाज़, कहानियाँ और प्रार्थनाएँ पीढ़ियों और महाद्वीपों में फैली हुई हैं,और हमें याद दिलाती हैं कि हम एक बहुत लंबे, जीवित प्रवाह का हिस्सा हैं।
मैं यह नहीं कहता कि आप जीवन भर उसी पेड़ के नीचे बैठे रहें।दुनिया भी आपकी प्रतीक्षा कर रही है।आपको फिर लौटना है, लोगों से मिलना है,कार्य करना है।लेकिन यदि आपको उस अनुभव का बस थोड़ा-सा अंश भी मिल जाए —तो याद रखिए:अनंत का एक छोटा हिस्सा भी अनंत होता है।और यदि आप उस समझ, उस रोशनी का बस थोड़ा-सा हिस्सा भी दुनिया से साझा करें —तो वह भी कई ब्रह्मांडों जितना मूल्यवान है।क्योंकि वही छोटा प्रकाश एक नए संसार का दरवाज़ा खोल सकता है,एक दूसरी वास्तविकता की झलक दे सकता है,एक नए मार्ग का संकेत बन सकता है।
मनन के लिए मूल प्रश्न
1. क्या यह संभव है कि अपनी पहचान और परंपरा से गहराई से जुड़ना हमें वास्तव में अधिक सार्वभौमिक, मानवतावादी , दयालु और शांतिप्रिय बना दे?
2. क्या आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया है, जब अपनी सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान को अपनाने से आप उससे भी आगे देख पाए —और इससे आपके भीतर या किसी रिश्ते में शांति या समझ पैदा हुई?
3. आप अपने जीवन में “पेड़ के नीचे बैठने”—मौन, ठहराव, मनन, ध्यान —जैसे पल कैसे बनाते हैं?और वे पल आपको अपने समय और समाज की सीमाओं से आगे देखने में कैसे मदद करते हैं?
Ariel Burger is a rabbi, as well as an artist and teacher. He’s the author of
Witness: Lessons from Elie Wiesel’s Classroom.
Seed Questions for Reflection
What do you make of the notion that deeply connecting with one's own particular identity and tradition could actually facilitate more universal commitments and contribute to becoming a person of peace? Can you share a personal story that illustrates a moment when embracing your cultural or religious identity allowed you to see or act beyond it, fostering a sense of peace or understanding with others? What helps you create space in your life for moments of reflection or meditation, akin to sitting under the tree, to explore new possibilities that transcend the culture of your times?