हर घटना को व्यतिगत नहीं मानना|
द्वारा मार्क मानसों
हमारी चेतना का हमारी बुद्धि में होने का एक अतिरिक्त असर यह होता है कि हम जो कुछ भी अनुभव करते हैं, उसमे हम हमेशा मध्य में होते हैं|
आज रास्ते में किसी कार ने हमारा रास्ता काट दिया | केबल समाचार जो मैंने गत रात्रि में देखा था उसने मुझे दुखी किया | हमारे कार्य संस्थान के जबरदस्त मुनाफे ने मुझे आर्थिक लाभ दिया| नतीजन, हम में एक आतंरिक झुकाव इस बात का होता है कि जो कुछ भी हमारे साथ होता है वो हमारे बारे में ही है|
ये एक आकाशवाणी है: चूँकि आपने कुछ अनुभव किया, चूँकि कोई बात आपको एक तरीके से महसूस कराती है, चूँकि आप किसी चीज़ का ध्यान रखते हैं, इसका मायने ये नहीं की ये सिर्फ आपके ही बारे में है|
मुझे पता है आपके सामने एक अद्भुत सूर्योदय है एवं आपके आस पास भीनी चट्टानें हैं, पर सही में , ये सिर्फ आपके बारे में नहीं है |
इसे याद रखना कठिन है| और ये सिर्फ इसलिए ही नहीं की हम हमारे दिमाग और हमारे शरीर में सन्निहित हैं , बल्कि इसलिए कि हमारा हर चीज़ को अपने बारे में बनाना , कुछ तरीकों से, अल्पकाल के लिए, हमें अत्यधिक ख़ुशी देता है|
ये सोच हमें ख़ुशी देता है कि हमारे साथ , जीवन में, जो कुछ भी अच्छा होता है, वो इसलिए होता है क्योंकि हम एक अच्छे, अद्भूत इंसान हैं| पर इसका मूल्य इस बात से भी चुकाना पड़ता है, कि जो कुछ आपके जीवन कें अच्छा होता अगर वो आपके बारे में है, तो जो कुछ बुरा आपके जीवन में होता है, वो भी आपके ही बारे में है| आपके जीवन की बुरी घटनाओं को भी आपको अपने बारे में ही मानना होगा|
और इस कारण आप एक स्वाभिमान के उतार चढाव वाले झूले पे सवार हो जाते हैं, जहाँ आपका अपना स्वावलम्बन ऊपर नीचे होता रहता है, कभी गगन चुम्भी आसमान का अनुभव तो कभी बिलकुल धरातल की धाराओं में बहने का अहसास और ये सब उस वक़्त जो भी आपके साथ हो रहा है, के फलस्वरूप होता है|
जब आपका समय अच्छा होता है तो आप अपने आपको इस पृथ्वी की एक ईश्वरीय भेंट मानने लग जाते हैं, जो हर मोड़ पे सम्मान एवं सराहना योग्य है| जब आपका बुरा समय आता है तो आप एक दंभी पीड़ित बन जाते हैं , जिसके साथ बुरा हुआ है, और जो इससे अच्छे का अधिकारी था|
इनमे जो सर्व विद्यमान है वो है अधिकारिता का बोध | और ये निरंतर अधिकारिता का बोध आपको एक भावुक पिशाच बना देता है, एक गैर सामाजिक काली गुफा, जो सिर्फ अपने आस पास वालों की शक्ति एवं प्यार ही लेता रहता है, बिना कुछ भी वापस किये |
ओके, ये थोडा ज्यादा नाटकीय था| पर आप अभिप्राय समझ गये हैं|
जब लोग आपकी आलोचना करते हैं या आपको अस्वीकार करते हैं, तो ये ज्यादा उनकी मनोस्थिति , उनके मूल्यांकन के आधार, उनके जीवन के उस वक़्त के हालात, से ज्यादा सम्बद्ध रखते है, ना कि आपसे | मैं आपको आगाह कराना चाहता हूं कि लोग आपके बारे में इतना सोचते नहीं हैं ( क्योंकि वस्तुतः वो इस बात को मानने में व्यस्त हैं, कि सभी चीज़ें उनके अपने बारे में ही हैं )|
जब आप किसी प्रयास में असफल होते हैं, तो इसका मायने ये नहीं की आप एक असफल व्यक्ति हैं, इसका मायने ये है की आप एक व्यक्ति हैं, जो कभी कभी असफल भी हो सकते हैं|
जब आपके साथ कोई शोकजनक घटना होती है और आप बहुत ही घोर आहत हो जाते हैं, और जब आपका दुःख आपको ये समझाने लगता है कि ये दुःख आपके बारे में ही है, तो याद रखें कि, विपत्ति , जीवन जीने का ही भाग है, मृत्यु का शोक ही जीवन को मायने प्रदान करता है, और दुःख कोई पक्षपात नहीं करता , ये सभी पे आता है| अधिकारिता या अनाधिकारिता, इस समीकरण के भाग नहीं हैं|
मनन के लिए बीज प्रश्न : इस बात से आप कैसा नाता रखते हैं कि जो आप कुछ अनुभव करते हैं वो आपके बारे में नहीं है? क्या आप कोई ऐसे वक़्त की कहानी साझा कर सकते हैं, जब आपने अपने अनुभवों से परे अपने आप को देखा हो? अपने अनुभवों को अपने बारे में ही विवेचन करने से रोकने में किस चीज़ से सहायता मिलती है?
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Seed Questions for Reflection
How do you relate to the notion that when you experience something, it's not all about you? Can you share a personal story of a time you were able to see beyond yourself in your experiences? What helps you resist interpreting your experiences as being all about you?