सबसे सरल ध्यान प्रक्रिया द्वारा मेल्विन म्क्लेओद
सभी चीज़ें उत्तम कैसे हो सकती हैं अगर वो पूरी तरह अव्यवस्थित हों?
ये प्रश्न, हमारी उस स्थिति के सन्दर्भ में, बिलकुल मध्य में होता है, , जिसे बौध धर्म के लोग संसार कहते हैं| ये वो अंतहीन चक्र है जिसे हमारे प्रयास चलाते रहते हैं, किसी टूटी हुई चीज़ को जोड़ने में, चाहे वो हमारे स्वयं में हो, चाहे वो हमारे जीवन में हो, चाहे वो हमारे संसार में हो|
क्या हो अगर कोई चीज़ वास्र्तव में टूटी हुई ही ना हो? क्या हो अगर हमारी समस्या यह हो कि कोई समस्या ही नहीं है, पर शायद हमें यह पता ना हो? क्या हो अगर हमारे इस समस्या को सुलझाने के सारे प्रयास ही उस समस्या को पहले पहल पैदा कर रहे हों?
ये कौन जानता है कि ये जाल कब और कैसे बिछाया गया है , पर अब हम उसमे हैं| इससे बाहर कैसे निकला जाए?
हम रुक जायें | हम कुछ भी ना करें, और देखें जो हमें दीख रहा है|
यह ही चीज़ बुद्ध ने की थी |
पहले उन्होंने सांसारिक संघर्ष को छोड़ा क्योंकि उन्हें अनुभव हुआ कि उससे जीवन, उम्र, बीमारी एवं मृत्यु कि समस्यायों का समाधान नहीं निकल सकता है| उसके पश्चात उन्होंने एक लम्बी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की , पर वह यात्रा भी काम नहीं आई| अंत में, वे एक वृक्ष के नीचे बैठे गये और अपने समस्त संघर्ष को छोड़ दिया |
वो बैठे रहे, बिना कुछ भी करते हुए, और किसी प्रबह्त तारे कि तरह ज्ञानोद्दीप्ति स्वयं प्रगट हुई | कुछ भी पाने की तृष्णा या प्रयास की जरूरत के हटते ही उन्हें आभास हुआ की सभी जीव जंतु, जो जैसे हैं, वैसे ही सहज रूप से ही ज्ञानोद्दीप्त हैं, और यह विश्व जैसे है, वैसे ही उत्तम है |कुछ भी टूटा हुआ नहीं है जिसे जोड़ने की जरूरत हो| हमें कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है|
ये सरल है, पर आसान नहीं है| कुछ नहीं करना ही हमारे लिए सबसे कठिन कार्य है|
हमारा संपूर्ण अस्तित्व ही कार्य करते रहने पे आश्रित है| हमें लगता है , हमें कुछ भी करते रहना है, अपना कल्याण सुनिश्चित करने के लिए, अध्यात्मिक प्रगति के लिए, अपने टूटे पन को जोड़ने के लिए, जीवित रहने के लिए|
सबसे ज्यादा , हमें यह भय है कि अगर हम कुछ भी नहीं कर रहे होते हैं तो हम पायेंगे कि हमारा अस्तित्व ही ख़त्म हो गया है| इसी को ही ज्ञानोद्दीप्ति की झलक कहते हैं|
हाँ यह सत्य है कि इस तरह का कुछ नहीं करना , पड़े रहने और आराम करते रहने से थोडा भिन्न है| इस का मायने है , हम जिस स्तर पे भी कुछ कर रहे हैं उसे रोक देना| इसका का मायने है प्रयास छोड़ देना| इसका मायने है कुछ नहीं करने का भी प्रयास छोड़ देना| इसका मायने है कुछ नहीं करने की भी दार्शनिकता या चिंतन नहीं करना , या कुछ नहीं करने का लक्ष्य नहीं साध लेना|
हमारी बुद्धि अत्यंत सूक्ष्म एवं चालाक है| हमें असीमित मानसिक विचारों के व्यर्थ उथल पुथल से पूर्णतयः बाहर खड़े हो जाना है| हमें बैठ जाना है और सब प्रयास छोड़ देने हैं , जैसे की बुद्ध ने किया|
जैसे ही , थोड़े से समय के ली भी , हम सब करना रोक पाते हैं, तो कहा जाता है कि हमें जो झलक मिलती है वो पूर्ण सत्य की वास्तविकता की होती है, हमारे अपने बारे में, समस्त जीवों के बारे में, संपूर्ण घटनाओं के बारे में|
बौद्ध धर्म में इसे कई नाम दिए गये हैं - ज्ञानोद्दीप्ति, बुद्ध स्वाभाव , हमारे मन का वास्तविक स्वरुप, महान उत्तमता, सामान्य मन, या सिर्फ “बौद्ध” |
जो वर्णन मुझे उपयुक्त लगता है वो है “ सर्वोच्च भाव से संपन्न शुन्यता “ | ये वज्रयाना परमपरा अनुसा है| इसका मायने है कि जो सत्य का मूल आधार है वो शुन्यता है, हमारी अशुद्ध मानसिक कल्पनाओं से मुक्त, परन्तु सभी सही गुणों यानि, विवेक, आनंद , करुणा, शांति, ज्ञानोद्दीप्ति से युक्त |
यानि जब हम खुद सभी चीज़ों को अव्यवस्थित करना बंद कर देते हैं, तो स्वयं उत्तमता आ जाती है|
मनन के लिए मूल प्रश्न : इस धारणा को आप कैसा मानते हैं कि सांसारिक एवं अध्यात्मिक संघर्ष के रुकने पर ही ज्ञानोद्दीप्ति का आगमन होता है|क्या आप ऐसे समय की निजी कहानी साझा करना चाहेंगे जब आपको अंदरूनी ऊँचाई का अहसास हुआ हो, कुछ ना करने या कुछ ठीक करने को रोकने पर? लगातार प्रगति के अन्य सूक्तों का यत्न ना करने के प्रयासों से संधि कर लेने में आपको किस चीज़ से सहायता मिलती है|
First appeared in the Mar 2020 editorial of Lion's Roar magazine.
Seed Questions for Reflection
How do you relate to the notion of arriving at enlightenment when both material and spiritual struggle ceases? Can you share a personal story of a time you experienced great insights after ceasing to do or fix? What helps you reconcile not striving with other dictums of continuous improvement?