क्या ईश्वर का कोई रूप है?
- आर्थर ओसबोर्न (२१ अगस्त, २०१९)
"क्या भगवान का कोई रूप है?" एक व्यक्ति ने एक बार महान भारतीय ऋषि, रमण महर्षि को चुनौती दी।
"कौन कहता है कि भगवान का कोई रूप है?" रमण ने वापिस जवाब दिया। प्रश्नकर्ता ने फिर पूछा, "यदि ईश्वर निराकार है तो क्या उसे मूर्ति का रूप देना और उसमें उसकी पूजा करना गलत नहीं है?"
उसने उनके वापिस दिए जवाब से समझा था कि, "कोई नहीं कहता कि भगवान का कोई रूप है।" लेकिन उनका मतलब वही था जो उन्होंने कहा था और अब प्रवर्धित हो गया था, "भगवान को अकेला रहने दो। मुझे पहले ये बताओ कि क्या आपका कोई रूप है।"
"बेशक मेरे पास रूप है, जैसा कि आप देख सकते हैं, लेकिन मैं भगवान नहीं हूं।" "क्या आप तब मांस और हड्डियों और खून से बने, और बढ़िया कपड़े पहने हुए भौतिक शरीर हैं?"
"हां, ऐसा ही होगा; मैं इस शारीरिक रूप में अपने अस्तित्व से अवगत हूं।"
"आप अपने आप को शरीर कहते हैं क्योंकि अब आप अपने शरीर के बारे में जानते हैं, लेकिन क्या आप यह शरीर हैं? क्या गहरी नींद में भी यह आप हो सकते हैं जब आप इसके अस्तित्व से काफी अनजान होते हैं?"
"हाँ, मैं गहरी नींद में भी इसी शारीरिक रूप में बना रहा होऊँगा क्योंकि जब तक मैं सो नहीं जाता हूँ, तब तक मुझे इसकी जानकारी रहती है और जैसे ही मैं जागता हूँ मैं देखता हूँ कि मैं वैसा ही हूँ जैसा जब मैं सोने के लिए गया था।"
"और जब मृत्यु होती है?" प्रश्नकर्ता ने रुककर एक मिनट सोचा, "ठीक है, फिर मुझे मृत माना जाता है और शरीर को दफनाया दिया जाता है।"
"लेकिन तुमने कहा था कि तुम्हारा शरीर ही तुम हो। जब इसे दफनाने के लिए ले जाया जा रहा होता है तो यह विरोध क्यों नहीं करता है और कहता:` नहीं! नहीं! मुझे मत ले जाओ! यह संपत्ति मैंने हासिल कर ली है, ये कपड़े जो मैंने पहन रखे हैं, ये बच्चे जिन्हें मैंने जन्म दिया है, वे सभी मेरे हैं, मुझे उनके साथ रहना चाहिए!''
आगंतुक ने फिर कबूल कर लिया कि उसने गलती से खुद की पहचान शरीर के साथ बना ली थी और कहा, "मैं शरीर के अंदर का जीवन हूं, अपना शरीर नहीं।"
तब रमण ने उसे समझाया: "अब तक तुम गंभीरता से अपने आप को शरीर मानते रहे हो और कि यह तुम्हारा एक रूप है। यही वह अज्ञान है, जो सारी मुसीबत का मूल कारण है। जब तक उस अज्ञान से छुटकारा नहीं मिल जाता, जब तक तुम अपनी निराकार प्रकृति को नहीं जानते, तब तक भगवान के बारे में बहस करना और प्रश्न करना कि क्या उसका कोई रूप है या वह निराकार है या क्या उसकी एक मूर्ति के रूप में पूजा करना सही है जब वह वास्तव में निराकार है, यह सब बेकार पांडित्य प्रदर्शन है।जब तक हम ख़ुद के निराकार रूप को नहीं देख पाते, तब तक हम वास्तव में निराकार भगवान की पूजा नहीं कर सकते।”
प्रतिबिंब के लिए मूल प्रश्न: आप ख़ुद को शरीर की बजाए, शरीर में जीवन के रूप देखने से क्या समझते हैं? क्या आप कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँट सकते हैं जब आप अपनी निराकार प्रकृति से अवगत हो सके हों? आपको बेकार पांडित्य दिखाने से बचने और अपने स्वयं के स्वभाव को खोजने में निहित रहने में क्या मदद करता है?
"रमण महर्षि और आत्म-ज्ञान का मार्ग" के अंश।
Excerpt from "Ramana Maharshi and the Path of Self Knowledge".
Seed Questions for Reflection
How do you relate to yourself as life in the body and not the body itself? Can you share an experience of a time you became aware of your formless nature? What helps you avoid pedantry and stay rooted in finding your own nature?