सिर्फ “पूरी तरह से इंसान ‘ होना ही पर्याप्त है।” - ब्रायन जे. प्लाच्टा के द्वारा
हम ऐसा क्यों करते हैं? हम खुद को क्यों सताते और अपनी आलोचना क्यों करते हैं? हम अपनी आत्म-छवियों के खिलाफ नकारात्मक शब्दों और विचारों की मिसाइल क्यों दागते हैं?
एक कारण तो पूर्णतावाद है। हम खुद से परिपूर्ण होने की उम्मीद करते हैं, और जब हम परिपूर्ण नहीं होते, तो हम खुद को शर्मिंदा करते हैं। हम नकारात्मकता की खाई खोदते हैं जो हमें बताती है कि हम बुरे हैं। दोषपूर्ण हैं। टूटे हुए हैं। हम अपनी प्राकृतिक आंतरिक अच्छाई के साथ विश्वासघात करते हैं।
खुद को कुछ पाने के लिए, अच्छा बनने और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करना एक अच्छी बात है। यह हमें लक्ष्य निर्धारित करने और उन तक पहुँचने, अपने सपनों को पूरा करने और दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने की अनुमति देता है। लेकिन इस प्रेरणा में तब गड़बड़ हो सकती है जब यह अहंकारी, शर्मनाक व्यवहार या कभी-भी- मैं- अच्छा-नहीं-हूँ वाली सोच में बदल जाती है।
क्या होगा अगर, जब हम खुद को अपनी आत्म-छवियों के खिलाफ नकारात्मकता का हमला करते हुए देखते हैं, तो हम रुक जाएँ , और इसके बजाय हमारे पास मौजूद एक अच्छे चरित्र गुण जो हम में हैं, , एक गुणवत्ता जो हमें अपने बारे में पसंद है , उसको देखें ? अपने आप को यह याद दिलाना कि हम अच्छे हैं, सिखाने योग्य हैं और प्यार करने योग्य हैं, यह एक सरल अभ्यास हो सकता है जो हमारे दिमाग में उपस्थित नकारात्मकता के बटन को बंद करने में मदद करेगा।
स्वयं की पुष्टि करने और अपने आपको स्वीकार करने की आदत को अपनाकर, हम जानबूझकर पूर्णतावाद (perfectionism) की अप्राप्य सीमा को कम करते हैं। हम स्वयं को पूर्णतः मानव (perfectly human) बनने की अनुमति देते हैं।
पूर्णतः मानव का मतलब है हम गलतियाँ भी करेंगे, और जब हम गलती करेंगे तो उसे मान भी लेंगे, और उससे सीख भी ले लेंगे| उसका मायने है हम अपने आपसे बिना शर्त के प्रेम करेंगे, और उस छवि और समानता को अपना लेंगे , जिसके साथ इश्वर ने हमें बनाया है – एक अच्छा इंसान, सबसे प्रेम करने वाला , इश्वर के साथ जिसका सम्बन्ध उस आतंरिक रोशनी द्वारा हो , जो हम सबके ह्रदय में वास करती है|
अगर अहम हर प्रकार से सही या पूर्ण थे , तो शायद हमें इश्वर की जरूरत ही नहीं पड़ती| हम खुद ही इश्वर हो जाते |पर हम इश्वर नहीं है और शायद हमें इश्वर बनना भी नहीं है| हमारा काम है एक प्रकार से सही, पूर्णतः इंसान बनना | एक अच्छा इंसान, अस्तव्यस्त और सीखने योग्य |हम इश्वर की मंडली के मानव वाला भाग हैं, जिसके द्वारा इश्वर इस संसार में ज्यादा प्रेम का सह-निर्माण करने का निमंत्रण देता है |
जब हम अपने आंतरिक युद्धों के साथ शांति बनाते हैं और बिना अपने आपको निर्णायक माने , हम अपने खुद के सभी हिस्सों को स्वीकार करते हैं, तो हम ईश्वर के लिए हमें प्यार करने के , खुद से प्यार करने के और फिर दूसरों के लिए बिना शर्त प्यार करने के गुणक बनने के लिए, अधिक स्थान बनाते हैं।
आंतरिक युद्ध को रोकें। इसके बजाय आत्म-स्वीकृति का हल उठाएँ। अपनी विनम्र अच्छाई की पुष्टि करें और खुद को पूरी तरह से इंसान बनने दें।
चिंतन के लिए बीज प्रश्न: आप इस धारणा से कैसे संबंधित हैं कि खुद को पुष्टि करने एवंअपने आपको स्वीकार करने से पूर्णतावाद की अप्राप्य दिखती सीमा कम हो जाती है? क्या आप उस समय की कोई व्यक्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं जब आप अपने आप से से बिना शर्त प्यार कर पाए थे ? आपको अपने अच्छे, बअस्तव्यस्त और सीखने योग्य हिस्सों को स्वीकार करने में किस चीज़ से मदद मिलती है ?
Brian Plachta is author and mentor. When a nun asked him to find a rule of life, his was -- Finding Flow.
Seed Questions for Reflection
How do we relate to the notion that affirming and accepting ourselves purposely lowers the unattainable bar of perfectionism? Can you share a personal story of a time you were able to love yourself unconditionally? What helps you accept the good, messy and teachable parts of you?