ध्यान पूछताछ से अभिन्न है
- मिशेल डी साल्ज़मान ( ७ नवंबर, २०१८)
जैसा हम आमतौर पर सोचते हैं, हमारा ध्यान उससे कहीं अधिक है। यह एक साधारण मानसिक या प्रमस्तिष्कीय प्रक्रिया से कहीं अधिक है। यह हमारे पूरे अस्तित्व से संबंधित है। यदि इसकी संभावनाएं हमारे सामान्य जीवन में पूरी तरह से यथार्थ बनने से बहुत दूर हैं, तो शायद इसलिए कि इसे एक बहुआयामी कीबोर्ड के रूप में और हमारे अस्तित्व के एक एकीकृत सिद्धांत के रूप में नहीं पहचाना गया है।
विरोधाभासी रूप से, जानने का यह मूल कार्य, जो ध्यान है, केवल तभी वास्तविक होता है जब हमें मालूम नहीं होता -- यानि कि, जब एक प्रश्न उठता है। इसका स्तर और, कहने के लिए, "कुलकरण" की हद हमारे प्रश्न पूछने के अनुपात में होते हैं। आपने निश्चित रूप से ध्यान दिया होगा कि जब कोई प्रश्न महत्वपूर्ण होता है - जब वो आपको गहराई से प्रभावित करता है, जैसा कहा जाता है -- कि यह सभी अनावश्यक हलचल, भावनात्मक ,शारीरिक और मानसिक, सबको निलंबित कर देता है। यह वास्तविक जागरूकता और संवेदनशीलता के लिए रास्ता साफ कर देता है, जो मेरे सम्पूर्ण ध्यान के ज़रूरी हिस्से हैं। केवल मेरे न जानने और मेरी जानने की इच्छा के बीच, मैं खुद को मौजूद, तैयार, खुला हुआ, नवीन पाता हूँ - यानि कि -- चौकस।
इसके सक्रिय रूप में, ध्यान इसलिए पूछताछ से अभिन्न है; यह अनिवार्य रूप से, इसकी शुद्धता में, पूछताछ का एक अधिनियम है। यह अधिनियम हमारे मानव अस्तित्व का विशेषाधिकार है। एक पशु अपने जीवित होने से संतुष्ट रहता है। एक मनुष्य की ज़िम्मेदारी है खुद से अपने अस्तित्व के बारे में सवाल करना।
हमारे समाज में, जो मुख्य रूप से उत्पादन और दक्षता से मतलब रखता है, नाटक यह है कि पूछताछ के लिए हमारी क्षमता, जो बचपन में अभी भी इतनी ज्वलंत होती है, जवाब देने की हमारी क्षमता के फायदे के लिए बहुत तेजी से उखड़ जाती है दूर हटा दी जाती है। जब एक बच्चे का असली सवाल होता है, तो आमतौर पर उसे तुरंत बेतुका जवाब दे दिया जाता है। सबसे अच्छी स्थिति में शिक्षक शब्दकोश में खोजता है ताकि उसका जवाब सही हो, लेकिन एक बेसुध तरीके से, अगर गर्व से नहीं; वह सवाल का अंत कर देता है। स्कूल से हमारे जीवन के अंत तक हमारा जवाब देना ज़रूरी है। हमें जवाब देना सीखने के लिए मज़बूर किया जाता है, अगर हमें जवाब देना नहीं आता, तो हम किसी काम के नहीं हैं। इसलिए धीरे-धीरे हम एक किस्म की मॉडल मशीन बन जाते है जो अपनी ही विरुद्धता की और आँख मूंदे, हर अवस्था के लिए सब जवाब दे सकती है[...]
क्या यह सम्भव है कि हम अपने अंदर हमारी सबसे प्रामाणिक और बहुमूल्य क्षमता को जीवित रख सकें - जो पूछताछ है? असल में यह वो पूरी समस्या है जिसका हम सामना कर रहे हैं। लेकिन क्या हम जवाब देते समय खुद से प्रश्न करने के लिए सशक्त, स्वतन्त्र, और सम्बद्ध हैं? [...] एक ही समय क्या हम न तो पुष्टि और न ही इनकार कर सकते हैं, न ही विरोध और न ही पालन कर सकते हैं, क्या मान सकते हैं कि हम न तो जानते हैं और न ही नहीं जानते, कि हम सक्षम हैं या असमर्थ हैं? क्या हम किसी भी समाधान या स्थिति से भागे बिना, न्याय या उदासीनता के बिना, क्या पूरी तरह से उपस्थित हो सकते हैं? इसका अर्थ होगा हर स्थिति की ओर सजग रहना, अज्ञात के लिए ज्ञात को त्यागना, पुनरावृत्ति के अपरिहार्य सिद्धांत का सामना करना, अपनी हलचल के बीच भी स्थिर रहना।
प्रतिबिंब के लिए मूल प्रश्न: अपने अस्तित्व के अर्थ के बारे में पूछताछ करने की धारणा से आप क्या समझते हैं? क्या आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँट सकते हैं जब आपने जवाब देते समय अपने आप से प्रश्न करने की स्वतंत्रता को अनुभव किया हो? प्रश्न करने से आपके जीवन में क्या फ़ायदा हुआ है?
गुर्जिफ परंपरा में सम्मानित, एक मनोचिकित्सक और एक आध्यात्मिक शिक्षक, मिशेल डी साल्ज़मान द्वारा लिखित "दो निबंध" से।
Seed Questions for Reflection
How do you relate to the notion that our responsibility is to inquire into the meaning of our being? Can you share a personal story of a time when you felt free enough to question yourself while answering? How has questioning helped you in your life?