Fearlessness can Coexist with Fear

Author
Gil Fronsdal
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Image of the Weekनिडरता और डर साथ-साथ रह सकते हैं

गिल फ्रौनसडल (५ फरवरी, २०१४)

ध्यान और माइंडफुलनेस अभ्यास में हम डर को भरोसे में बदलना सीख रहे हैं, एक आदर्श या कल्पना की तरह नहीं, बल्कि आत्म-विश्वास के एक ऐसे अहसास की तरह जो डर को अच्छी तरह से जान लेने की वजह से उठता है। बहुत से लोगों को डर से डर लगता है, उन्हें उससे ज़बरदस्त घृणा होती है, और वे खुद को पूरी तरह उस डर के अंदर प्रविष्ट होने की अनुमति नहीं देते। अगर हम अपने आप को अपने डर का आसानी से पूरी तरह अनुभव करने दें, तो आखिर हम जान जाते हैं कि हम उससे परेशान हुए बिना ऐसा कर सकते हैं। विशवास बनता है, केवल विशवास करने की इच्छा बनाने से नहीं, बल्कि खुद यह जान पाने से कि हम अपने अनुभव के लिए मौज़ूद रह सकते हैं और उससे परेशान नहीं हो जाते।

हम में से बहुत से लोगों को समाज द्वारा, अपने खुद की ज़िंदगी के अनुभवों के द्वारा, और हमारे अपने तर्क द्वारा मनवा दिया गया है कि हम अपनी प्राकृतिक अवस्था पर विशवास नहीं कर सकते। हम अपने आप से और अपने अनुभवों से मुंह मोड़ लेते हैं। माइंडफुलनेस अभ्यास में हम सीख रहे हैं कि कैसे अपनी भावनाओं का नाश या उनका नियंत्रण न किया जाए, बल्कि कैसे उन्हें पहचाना जाए और उनके साथ मौज़ूद रहा जाए। जब हम पूरी तरह से उनमें प्रवेश कर लेते हैं और उन्हें जगह देते हैं, तो हमें दिखाई देने लगता है कि वे कैसे काम करती हैं। हमें दिखाई देने लगता है कि हम अपनी भावनात्मक ज़िंदगी और प्रतिक्रियाओं का निर्माण कैसे करते हैं।

इस प्रक्रिया में हम जागरूकता और जो ठीक हमारे सामने है, उस पर ज़यादा से ज़यादा विशवास करना सीखते
हैं। हम जैसे-जैसे अपने डर की तहों को जांचते हैं, हम कौन हैं, इस बात पर हमारा विश्वास बड़े से बड़े दायरों में बढ़ता जाता है। जागरूकता की इस प्रक्रिया को बढ़ते हुए विशवास के दायरों की तरह समझा जा सकता है। जागरूकता तब आती है जब विशवास पूर्ण-व्यापक हो जाता है।

इस प्रक्रिया में, हम जागरूकता और जो ठीक हमारे सामने है, उस पर ज़यादा से ज़यादा विशवास करना सीखते हैं। हम जैसे-जैसे अपने डर की तहों को जांचते हैं, हम कौन हैं, इस बात पर हमारा विश्वास बड़े से बड़े दायरों में बढ़ता जाता है। जागरूकता की इस प्रक्रिया को बढ़ते हुए विशवास के दायरों की तरह समझा जा सकता है। जागरूकता तब आती है जब विशवास पूर्ण-व्यापक हो जाता है।

बिना किसी मदद, सहारे, विचार या दृष्टिकोण के, हम जागरूकता और अपने ज़िंदा होने पर विशवास करना सीख सकते हैं। बौद्ध परम्परा में ऐसे लोगों को डर का नाश करने वाला कहते हैं। वे निडरता की भेंट देते हैं। निडरता सिर्फ डर का न होना ही नहीं है। यह एक अच्छा गुण है जो डर से उत्पन्न होने वाली सीमाओं को पार करते हुए, डर के साथ-साथ ज़िंदा रह सकता है। ऐसी निडरता हमारे आस-पास के लोगों के लिए परम देन हो सकती है। जब हम निडर बनने की शक्ति को बढ़ाते हैं, तो यह हम सिर्फ अपने लिए ही नहीं करते, बल्कि औरों के लिए भी करते हैं।

गिल फ्रौनसडल, "द इशू ऐट हैंड" से

विचार के लिए कुछ मूल प्रश्न: निडरता की भेंट देने से आप क्या समझते हैं? डर और निडरता के एक साथ रह पाने से आप क्या समझते हैं? क्या आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बांटना चाहेंगे जहाँ आपने डर और निडरता दोनों का एक साथ अनुभव किया हो?


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