Art And The Practice Of Being Yourself

Author
Stanley Kunitz
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Image of the Weekस्वयं होने की कला और उसका अभ्यास

- स्टैनले कुनितज

विश्व में केवल एक ही प्रकार के कलाकार नहीं होते, कलाकार बन्ने का कोई एक तरीका नहीं है। सबसे ऊपर एक आवश्यकता है अपने अस्तित्व के स्रोत को जानने कि ताके आप स्रोत को पहचान सकें और जान सकें के आप कौन हैं। अगर आपने अपने आतंरिक जीवन का अन्वेषण नहीं किया है तो आप एक कलाकार कैसे हो सकते हैं ? मनुष्य में ऐसा कुछ है जिसे मै सबसे साधारण शब्दों में, एक आवश्यकता कहूंगा, अपने मूर्त स्वरुप के पार जा कर एक ऐसा व्यक्ति बन्ने की जो अपने विशिष्ट व्यक्तिगत गुणो से जाना जाता है.…

कवि ब्लेक के शब्दों में, " हमें एक प्रणाली बनानी चाहिए नहीं तो हम किसी और द्वारा बनाई गई प्रणाली एक गुलाम होंगे।" आपको स्वयं होने का अभ्यास करना पड़ेगा नके असंख्य संख्याओं एक विश्व में मात्र एक संख्या बनकर रहना …

इस रचनात्मक भेंट के मूल बहुत जटिल हैं; आप अनुभव का संचय और पाचन कर रहे हैं, उसका अर्थ समझने का प्रयत्न करते हुए, बजाये के उनको एक कोठरी में भरकर आप के साथ अगली होने वाली घटना के साथ आगे बढ़नेके।
और अगर आप अपने अनुभवों से कुछ नहीं सीखते हैं तो आप एक व्यक्ति या एक कलाकार एक रूप में कभी परिपक्व नहीं हो सकते।

मुझे लगता है के आप लगभग खाली तिजोरी ले कर जन्म लेते हैं। और सबसे पहले अनुभव तो जन्म से पहले ही गर्भ में होने लगते हैं और आपकी तिजोरी भरने लगती है अमूल्य रत्नो से या कष्टदायक यादों से। हर विनाशकारी अनुभव कि याद एक घाव के साथ - साथ एक चेतावनी कि तरह आपके साथ रहती है। आपको उन दुविधाओं को पहचानना सीखना पड़ेगा जिनसे आप एक बार पहले गुज़र चुके हैं। आपको उस अनुभव के पहचान पत्र में उसकी कीमत देखनी पड़ेगी।

स्व को बनाने में बहुत सारी यादों का योगदान होता है, पर उन में से कुछ यादें, बिलकुल केंद्रीय यादें होती हैं। वे बहुत दर्दनाक हो सकतीं हैं, पर वे एक रचनात्मक व्यक्ति के ख़ज़ाने कि बहुमूल्य स्फटिक होते हैं.…

एक तरह से, सभी प्रकार कि रचनात्मकता एक प्रक्रिया है उनको अर्थ देनेकी जिनका सार्वभौम ( universal ) रूप से कोई अर्थ नहीं है। पौधा और कवी और माली इन असमान और अस्त-व्यस्त बारिश की बूंदोंको, सूर्य किरणों को और उड़ते हुए पक्षियों को संजोते हैं और इन से कुछ औपचारिक बनाते हैं। रचनात्मकता उन चीज़ों को स्वरुप देती है जो प्रकृति में अस्पष्ट और सांकेतिक रूप से स्तीथ है।

शुरुआत में भाषा का अस्तित्व नहीं था। उसकी रचना लोगों को विभिन्न प्रकार के अनुभव होने के बाद हुई, जब वे अभीव्यक्ति के द्वारा अपने जीवन को अर्थ प्रदान करना चाहते थे...

एक कलकार के रूप में आप मनुष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं - आपको यह विश्वास रखना होगा के जब आप कुछ मूल्यवान बनाने के प्रयत्न में अपना सर्वस्व समर्पित करते हैं, आप ऐसा केवल अपने आवेगों और इच्छाओं कि पूर्ति के लिए नहीं करते, उस प्रयत्न कि सामाजिक अनिवार्यता भी है। अगर आप अपनी समस्याओं का हल करते हैं और उनके बारे में ईमानदारी से बात करते हैं आप औरों कि भी मदद करते हैं, इतना काफी है। और इस तरह वह प्रयत्न एक नैतिक ​कर्तव्य बन जाता है।

स्व - अन्वेषण के लिए कुछ प्रश्न :-
आप, " आपको स्वयं होने का अभ्यास करना पड़ेगा नके असंख्य संख्याओं एक विश्व में मात्र एक संख्या बनकर रहना " का अभ्यास कैसे करते हैं?
" सभी प्रकार कि रचनात्मकता एक प्रक्रिया है उनको अर्थ देनेकी जिनका सार्वभौम ( universal ) रूप से कोई अर्थ नहीं है " आप इस विचार से कैसे जुड़ते हैं?
नैतिक कर्त्तव्य से हुए मूल्य वर्धन कि एक निजी कहानी क्या आप हमसे बाँट सकते हैं?


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