Futility of Search

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Author Unknown
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Image of the Weekखोज की निरर्थकता

शिष्य ने गुरु के सामने देखा. गुरु कितने शांत और शांतिपूर्ण थे जबकि शिष्य उत्तेजित, बैचेन और उल्ज़न में था|

उसने गुरु से पूछा : "आप वो क्या जानते है जो में नहीं जानता?" और गुरुने उत्तर दिया "में कुछ नहीं जानता"|

शिष्यने कहा "लेकिन कुछ तो है जो आप समजते है पर में नहीं समज पा रहा" | गुरुने उत्तर दिया " में समज चूका हु की कुछ भी समजने लायक नहीं है" |

शिष्य ने कहा : "लेकिन में देख सकता हु की आप कही तक पहुच चुके हो" | गुरुने तुरंत कहा " हा, में वहां पहुच चूका हु जहा से में था |

शिष्य: "फिर भी, में देख सकता हु के आप असाधारण बन चुके हो"

गुरु: " नहीं, में तो एकदम साधारण बन चूका हु. में चीजों को वेसे ही स्वीकार करता हु जैसे वो है"|

शिष्यने अब विफल होकर पूछा "गुरूजी, आप पहेलिया मत सुनाओ. मुझे ये बताओ के मुझे करना क्या चाहिए"?

गुरूजी ने कहा: "तुम्हे कुछ नहीं करना है| बस जैसे हो वेसे ही रहो| जीवन को बहने दो| बिचमे हस्तक्षेप मत करो| बस अपने आप में ही रहो"|

अब शिष्य खो चूका था और बहुत निराश हो गया था| उसका मन कुछ कार्य करना चाहता था लेकिन गुरूजी ने कहा की कुछ करने लायक नहीं है, बस अपने आप में रहो|

आखिरकार दया से गुरूजी ने सुझाव दिया: "अपनी सांसो को देखो, अपने पेट को उपर नीचे जाते हुए देखो, अपनी तीसरी आंख पे ध्यान केन्द्रित करो, अपनी रीढ़ के निचले भाग दो देखो, अपने मंत्र का स्मरण करो| ये मनको शांत करने के प्राथमिक तरीके है| जब आप किसी बन्दर को पेड़ देते हो, तो वह बन्दर पेड़ पे चढ़ उतर करता है, तब तक की जब तक वह थक न जाये| अंतमे वह आराम करता है| विश्राम करते वक्त ही उसकी अंतद्रिस्टी जागती है|

अज्ञात लेखक

आत्म निरिक्षण के लिए प्रश्न:
आप एक साधारण परिस्थिति का स्वीकार करके उसे एक असाधारण उपलब्धि कैसे बनायेंगे? अपनी अंतदृष्टि को कैसे जगाया जा सकता है? क्या आप आपके जीवन का कोई उदहारण दे सकते है जिसमे सच्चे विश्राम ने आपकी अंतदृष्टि को जगाया हो?


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