
स्वतंत्र इच्छा और ज़िम्मेदारी
सूज़न ब्लैकमोर के द्वारा।
क्या मेरे पास स्वतंत्र इच्छा (Free Will) है?
नहीं।मैं उन अनुभूतियों, विचारों और कार्यों से अलग नहीं हूँ, जो मेरी दुनिया बनाते हैं।और यदि “मैं” वही हूँ जो संसार प्रतीत होता है,तो फिर हम दोनों — मैं और संसार —एक साथ मिलकर यह सब कर रहे हैं।अब ये क्रियाएँ ऐसी लगती हैं,मानो वे अपने आप हो रही हैं।
लेकिन!
फिर चिंता उठती है —अगर यह सब अपने आप हो रहा है,तो क्या मैं किसी बात के लिए ज़िम्मेदार नहीं हूँ? यह सोच डरावनी लगती है।
मैं किशोरावस्था से ही इस प्रश्न को बुद्धि स्तर पर टटोलती रही हूँ।तब मैंने समझ लिया था कि स्वतंत्र इच्छा शायद एक भ्रम है।लेकिन ध्यान में कई वर्ष बिताने के बाद ही मैंने इस प्रश्न का सामना पूरी तरह भीतर से किया।
मैं वेल्स के मैनल्विड (Maenllwyd) में एक ज़ेन रिट्रीट पर थी,और बहुत गहरे अभ्यास में लगी हुई थी।उस सप्ताह हमारे शिक्षक कैलिफ़ोर्निया से आए एक ज़ेन मास्टर थे,जो अभ्यास में हमें पूरी शक्ति से लगवा रहे थे।
मैंने उनसे व्यक्तिगत संवाद का समय लिया।मैं नियत ढंग से झुकी,नियत मुद्रा में बैठी,उनकी चमकदार आँखों में देखा,और हिम्मत करके कह दिया —कि अंत में कोई भी किसी भी चीज़ के लिए सच में ज़िम्मेदार नहीं होता।
वे थोड़ा हँसे।और गर्म, उत्साह भरी मुस्कान के साथ बोले —“हाँ, अंतिम स्तर (Ultimately) पर यह सही है” उनके “Ultimately” कहने पर मुझे ज़ेन का वह अंतर याद आया —जहाँ एक परम दृष्टि होती है और एक सापेक्ष दृष्टि।सोचने लगी,शायद किसी दूसरे स्तर पर यह उतना सच न हो।
मैंने तुरंत पूछा —“तो ज़िम्मेदारी का क्या?”
उन्होंने सरलता से कहा —“ज़िम्मेदारी लो।”
मैं उलझ गई।“कौन ले? और क्या ‘ज़िम्मेदारी लेना’ स्वयं एक काम नहीं है?जब अलग ‘मैं’ ही नहीं, तो यह कर्ता कौन?”
धीरे-धीरे, वर्षों में,जैसे-जैसे स्वतंत्र इच्छा का अहसास कमज़ोर पड़ता गया,मैंने उनकी बात को याद रखा,और यह बात भीतर उतरती गई। स्वतंत्र इच्छा का भ्रम गहरी जाँच में टिकता नहीं।वह धीरे-धीरे पिघल जाता है।अब मुझे उसका आकर्षण भी महसूस नहीं होता।
लोग पूछते हैं —मैंने यह कैसे किया? कैसे “फ्री विल” को छोड़ दिया? मैं उन्हें तरीका नहीं बता पाती।
मुझे बस इतना याद है कि मैंने इस विषय पर वर्षों तक बौद्धिक स्तर पर संघर्ष किया।लेकिन सिर्फ दिमाग से सोचना हमेशा एक खाई बना देता है —एक ओर वह जिसे हम तर्क से सही मानते हैं,और दूसरी ओर वह जैसा संसार हमें अनुभव होता है।मैं इस दोहराव में सहज नहीं थी।
मुझे यह भी नहीं स्वीकार था, कि मैं जीवन ऐसे जीती रहूँ मानो स्वतंत्र इच्छा हो,जबकि तर्क और विज्ञान कहते थे ,कि यह संभव नहीं।
इसी बौद्धिक बेचैनी ने मुझे निर्णयों को सीधे देखने की ओर धकेला —कि वे वास्तव में कैसे होते हैं।और फिर उस “स्व” की तलाश की जो यह मानता है कि वह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले रहा है।
धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ
कि यही “स्व” —सबसे गहरा भ्रम है।
मनन के लिए प्रश्न- 1- यदि वास्तव में हमारे पास स्वतंत्र इच्छा न हो,फिर भी इस साझा अस्तित्व में हमें ज़िम्मेदारी लेने के लिए क्यों कहा जाता है —आप इस विचार को कैसे देखते हैं?
2- क्या आपके जीवन में ऐसा कोई अनुभव हुआ ,जिसने फ्री विल या ज़िम्मेदारी की आपकी समझ को हिला दिया हो—और आपको दुनिया में अपनी भूमिका पर फिर से सोचने को मजबूर किया हो?
3- जब फ्री विल एक भ्रम-सा लगता है,तब भी अपने जीवन में ज़िम्मेदारी लेने की आदत आप कैसे विकसित करते हैं?कौन-सी साधनाएँ, अभ्यास या अनुभव इसमें आपकी मदद करते हैं