
शांति से बैठना क्यों बेचैनी महसूस करा सकता है? द्वारा कोर्टलैंड दहल
2010 के मध्य में, वर्जीनिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक वर्त्तमान में-प्रसिद्ध प्रयोग किया । उन्होंने कॉलेज छात्रों से कहा कि वे केवल 6 से 15 मिनट तक शांति से बैठें, अपने विचारों के साथ अकेले—न कोई फोन, न किताब, कुछ भी नहीं। कई प्रतिभागियों को यह इतना असुविधाजनक लगा कि उन्होंने स्थिर बैठने के बजाय खुद को हल्के बिजली के झटके देना पसंद किया।
यहाँ ये क्या हो रहा है?
जब मन व्यस्त नहीं होता, तब मस्तिष्क का डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क (DMN) सक्रिय हो जाता है। यह नेटवर्क—दिमाग के उस आगे के हिस्से है, जो स्वयं से जुड़े विचार, निर्णय लेना और सामाजिक सोच में काम करते हैं , और दिमाग के बीच–पीछे के हिस्से जो स्मृति, आत्मचिंतन और भविष्य/अतीत के बारे में सोचना नियंत्रित करते हैं , —को जोड़ता है और आत्म-संदर्भित सोच में गहराई से शामिल होता है: जैसे अतीत के पछतावों को दोहराना, भविष्य की चिंता करना और "मैं" की अपनी मानसिक कहानी को मजबूत करना।
इसीलिए कुछ न करना बेचैन कर सकता है—यह उस मश्तिष्क में चल रहे निरंतर वार्तालाप (बकबक) को सतह पर ले आता है, जिसे हम आम तौर पर लगातार गतिविधियों और ध्यान भटकाव से दबाए रखते हैं।
लेकिन यहीं से यह रोचक हो जाता है।
टोरंटो विश्वविद्यालय के नॉर्म फ़ार्ब और चिंतनशील तंत्रिका विज्ञान , यानि ध्यान और मेडिटेशन का मस्तिष्क पर असर के विज्ञान, के अन्य शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि जब लोग वर्तमान में रहने का अभ्यास करते हैं, तो उनकी मस्तिष्क गतिविधि में गहरा बदलाव आता है।
डिफ़ॉल्ट मोड शांत हो जाता है, यानी दिमाग में कम जुगाली (बार-बार सोचना) और कम आत्म-वार्ता (अपने आप से कहानियाँ बनाना या मन ही मन बातें करना) होती हैं। .संवेदी (इंद्रिय-संबंधी) और आंतरिक अनुभवों को पहचानने वाले नेटवर्क्स में गतिविधि बढ़ जाती है—जिनमें इंसुला भी शामिल है, जो हमारे शरीर की आंतरिक अवस्थाओं जैसे सांस, दिल की धड़कन और भावनाओं पर नज़र रखता है।" इस बदलाव को अक्सर ऐसे समझाया जाता है कि हम कहानी बनाने वाले 'मैं' से अनुभव करने वाले 'मैं' की ओर बढ़ते हैं—यानी जीवन के बारे में सोचने से हटकर जीवन को सीधे जीने और महसूस करने की ओर।
और भी उल्लेखनीय बात यह है: ये बदलाव सिर्फ क्षणिक नहीं होते, ये सीखे जा सकने वाले कलाएं हैं। और जैसा कि रिचर्ड डेविडसन अक्सर कहते हैं, निरंतर अभ्यास से ये क्षणिक अवस्थाओं के बजाय स्थायी गुण बन सकते हैं—यानी आपका मस्तिष्क जागरूकता में स्वाभाविक रूप से विश्राम करना सीख लेता है, जब आप ध्यान नहीं भी कर रहे होते हैं।
चिंतन के लिए बीज प्रश्न : आप इस धारणा को कैसे देखते हैं कि हमारे मस्तिष्क की डिफ़ॉल्ट सेटिंग आत्म-संदर्भित सोच पर केंद्रित होती है, एवं आप अपने मश्तिष्क में निरंतर चल रही बकबक के उस अनुभव को कैसा मानते हैं जब आप अपने आपको बिना किसी अन्य मन बहलाने वाले कार्य के बिना पाते हैं ? क्या आप कोई व्यक्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं जो उस समय को दर्शाती हो जब आप कहानी वाले स्व में उलझे रहने से आगे वर्तमान क्षण में जीवन का पूर्ण अनुभव करने की ओर बढ़ गए ? आपको वर्तमान क्षण की जागरूकता की आदत विकसित करने में आपको किस चीज़ से मदद मिलती है, ताकि आपका मस्तिष्क धीरे-धीरे जुगाली से हटकर खुली जागरूक अवस्था में स्वाभाविक रूप से विश्राम कर सके?