The Laughter Thief


Image of the Weekहमारी हँसी के चोर , सोरेन गॉर्डहैमर के द्वारा

मैंने हाल ही में पढ़ा था कि औसतन एक 4 साल का बच्चा दिन में लगभग 300 बार हँसता है। और औसतन 40 साल का इंसान? सिर्फ़ चार बार। तो फिर जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हममें से इतने लोग अपनी हँसी क्यों खो देते हैं? हाँ, बड़ों की ज़िंदगी में ऐसी ज़िम्मेदारियाँ आती हैं जिनका बच्चों को सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन फिर भी, आप देखेंगे कि हम जितना हँसते है, उससे ज़्यादा तो हँसना ही चाहिए।

तो किसने या किस चीज़ ने हमारी हँसी और ख़ुशी चुरा ली है? इसका एक कारण आधुनिक जीवन है, जिसकी चुनौतियाँ और दबाव हैं। चार साल के बच्चों को बिल नहीं भरने होते। इसका एक हिस्सा हमारे अपने मन से जुड़ा भी है, और यह उस देखने से जुड़ा है, जिस से हम जीवन को देखते और जीते हैं। हमारे दिन एक चुपचाप चलने वाली तानाशाही से शासित हो सकते हैं — हमारी पसंद, नापसंद और " यह होना चाहिए" की प्रवृति ।
"चीज़ें ऐसी होनी चाहिए, वैसी नहीं। लोग ऐसे बर्ताव करें, वैसे नहीं। दुनिया जैसी है, वैसी नहीं होनी चाहिए।"मेरे एक शिक्षक कहा करते थे, "हम पर पूरी ज़िंदगी ‘यह होना चाहिए’ लादे गए हैं। हम दूसरों पर ‘यह होना चाहिए’ थोपते हैं और दूसरे हम पर।" और हमारी नसें ऐसे व्यवहार करती हैं मानो हम हमेशा कोई आपातकाल स्थिति में हों ! हमेशा कुछ न कुछ ग़लत हो रहा हो। लेकिन अगर हम रुककर अपने आप से पूछें, "अभी इस पल मेरे पास कौन-सी समस्या है?" तो हम क्या जवाब देंगे?

हाँ, चुनौतियाँ वास्तविक हैं। और दुनिया को कई बार हमारी देखभाल की ज़रूरत होती है। लेकिन हम कितनी समस्याओं को अपने अन्दर समा लेते हैं? जब हम सजग नहीं होते, तो हमारा शरीर और हमारी नसें ऐसे प्रतिक्रिया देती हैं जैसे हमेशा कोई ख़तरा हो, भले ही वास्तव में ऐसा न हो। समय के साथ, वह लगातार होता तनाव उस रूप में बदल जाता है जिसे हम ज़हरीला तनाव (toxic stress) कहते हैं। और मुझे लगता है कि आधुनिक दुनिया में हम में से लगभग हर कोई इसका कुछ हिस्सा तो ज़रूर ढो रहा है।

इसके इलाज कई तरह के हैं : प्रकृति में समय बिताना। दोस्तों के साथ समय बिताना। अपने अन्दर झाँकने का समय। और यह सोचने का समय कि वास्तव में क्या मायने रखता है। जब हम यह जागरूक होते हैं कि असल में मायने क्या रखते हैं … यानि जीवन जैसा है वैसा ही है …

" तब हम देखते हैं कि हमारी अधिकांश चुनौतियाँ कोई "घटना" या "चीज़" नहीं है, बल्कि उसके प्रति हमारा संबंध है। "यदि आप किसी बाहरी कारण से परेशान हैं, तो वह पीड़ा उस कारण से नहीं, बल्कि उसके बारे में आपके अपने अनुमान से आती है; और इसे आप किसी भी क्षण बदलने की शक्ति रखते हैं।" —मार्कस ऑरेलियस।

तब हम बिना इस लगातार तनाव के कार्य कर सकते हैं। जब जीवन "यह होना चाहिए" की परीक्षा न होकर सीखने की यात्रा बन जाता है, तब उसमें अधिक सहजता और हल्कापन आ जाता है। शायद हमारी हँसी फिर लौट आए।

चिंतन के लिए बीज प्रश्न: आप इस विचार के बारे में क्या सोचते हैं कि जैसे-जैसे हमारी उम्र होती हैं, हमारी हँसी कम इसलिए नहीं होती कि जीवन की मांगें बढ़ जाती हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि हम अपने अन्दर " यह होना चाहिए" और अपनी उम्मीदें जमा कर लेते हैं? क्या आप कोई व्यक्तिगत अनुभव साझा कर सकते हैं जब आपने बाहरी दबावों के बावजूद अपने दृष्टिकोण को तनाव या मजबूरी से हटा कर , सहजता या हँसी की ओर मोड़ लिया? आपको अपने जीवन में यह देखने कि आपकी दैनिक आदत विकसित करने में , कि वास्तव में क्या मायने रखता है , जिसके फलस्वरूप आपकी जीवन अधिक हंसी और हल्कापन आ सके, किस चीज़ से मदद मिलती है?
 

Soren Gordhamer is the founder of Wisdom 2.0.


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