Imagination Is Not Day-Dreaming


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“कल्पना दिवा-स्वप्न नहीं है”
फीबी टिकल के द्वारा

कल्पना एक महाशक्ति है। समाज में हर बड़ा परिवर्तन पहले किसी व्यक्ति — या किसी छोटे समूह की सामूहिक कल्पना — में शुरू हुआ। चाहे वो महिलाओं को मतदान का अधिकार मिलना हो, नागरिक अधिकार आंदोलन हो या फिर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार — सबकी जड़ें किसी की कल्पना में थीं। कुछ लोग कहते हैं कि यही गुण हमें सबसे अलग बनाता है — खासतौर पर हमारी यह सामूहिक रूप से नया सोचने की क्षमता।

लेकिन कल्पना को उसके असली रूप में नहीं पहचाना जाता — जबकि यही वह अनमोल और गहराई से भरी ताक़त है, जिससे नए और क्रांतिकारी बदलाव जन्म लेते हैं। अक्सर इसे दिवा-स्वप्न, कल्पना लोक या फालतू फैंटेसी मानकर खारिज कर दिया जाता है। अगर कोई नौकरी के लिए “कल्पनाशीलता” को अपने CV में लिख दे, तो शायद लोग हैरान रह जाएँ। स्कूल से ही हमें दिवा-स्वप्न देखने पर डांटा जाता है, जिससे शुरुआत से ही यह भाव बनता है कि यह व्यर्थ या विलासिता है। अगर यही सोच पूरी ज़िंदगी हमारे संग बनी रहे — और हमारे संगठनात्मक और सामाजिक तंत्र हमारी कल्पना को सीमित करते रहें — तो क्या होगा? यह बिल्कुल आम बात है कि जब चीज़ें कम हो जाती हैं या हालात मुश्किल हो जाते हैं, तो लोग कल्पना को ज़्यादा ज़रूरी नहीं मानते।जब लोग अभाव, कठिनाई और अनिश्चितता का सामना कर रहे होते हैं ,तो ऐसे समय में सब सिर्फ यह सोचते हैं कि काम जल्दी और सही तरीके से हो जाए। वे सीधे-सीधे हल चाहते हैं, और सोचते हैं कि कल्पना सिर्फ समय खराब करने वाली चीज़ है — कोई हल्की, अधूरी बात, जो सिर्फ किसी मज़ेदार मीटिंग या आउटिंग में ठीक लगे, लेकिन असली नियम बनाने या सिस्टम बनाने में काम की नहीं होती।

कल्पना करो अगर हम गलत हों। और इंग्लैंड में जब तापमान इस हफ्ते उच्चतम सीमा तक पहुँच गया, तो यह भावना बढ़ती जा रही है कि हम रास्ता भटक गए हैं। चीज़ें गलत हो चुकी हैं – और आवश्यकता है उन्हें सही किए जाने की। पर हम यह कैसे करें जब नीतियाँ, ज़िम्मेदारी, दूरदर्शिता और कार्यशीलता एक बंद जाली में फंसी प्रतीत होती हैं? हम ऐसी समस्याओं को कैसे सुलझाएँ जिनकी गहरी जड़ें हैं – अगर हम वही पुरानी पद्धति इस्तेमाल करेंगे, तो हमें वही उत्तर मिलेंगे जो अब तक मिलते आए हैं।

चुनौतियाँ जो हमारे सामने हैं, वह अत्यंत उलझी हुई हैं, और किसी एक व्यक्ति या एक उपाय द्वारा सुलझ नहीं पाएँगी। जिस प्रकार एक मधुमक्खी कई स्थानों पर जाने के बाद ही अपने मधुमक्खी-छत्ते की जगह निर्धारित करती है, उसी प्रकार हमारे मन को भी आवश्यकता है भटकने की, और विभिन्न संभावनाओं में से सबसे उपयुक्त रास्ता खोजने की। हमारी कल्पना शक्तियां अत्यंत ही मददगार हो सकती हैं हमारे मश्तिष्क में विभिन्न परिदृश्यों को चित्रित करने में, और उसके पश्चात उन्हें अलग बनावटी या स्वांग भरी चीजों के मध्य जांचने में|


मनन के लिए मूल प्रश्न:
आप इस धारणा को कैसे मानते हैं कि कल्पनाशक्ति – जिसे हम दिन में सपने देखना या तृष्णा कहकर नकार देते हैं – वास्तव में उस मौलिक आविष्कार का मुख्य स्रोत है, जिससे एक नई दुनिया अस्तित्व में आती है?

क्या आप एक निजी कहानी साझा कर सकते हैं, जिसमें आपने अपनी कल्पनाशक्ति का उपयोग किसी वास्तविक चुनौती को सुलझाने में किया, और उसी से आगे चलकर एक अप्रत्याशित अथवा आविष्कारी समाधान निकल पाया?

आपको अपने मन को भटकने और विभिन्न संभावनाओं में खोजने वाली आदत को अपनाने में किस बात से मदद मिलती है, मानो आप मधुमक्खी की तरह अपने छत्ते के लिए उपयुक्त जगह खोज रहे हों – अपने जटिल, उलझे सवालों के नवीनतम जवाब ढूँढ़ने में?
 

Phoebe Tickell is a scientist, complexity thinker, and social entrepreneur. Excerpt above from here.


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