Mother Earth's Humming


Image of the Week*धरती मां की गुनगुनाहट*
युरिया सेलिडवेन के द्वारा

अब भी वह लहराती है। अब भी वह गुनगुनाती है, धड़कती है, कांपती है। अब भी वह आसमान के नीचे सांस लेती है, बुदबुदाती है।
जब हम ध्यान देते हैं, तो जो सुनाई देता है वह है तात्कालिकता की पुकार। जल घूमता है, हवाएँ उठती हैं, अग्नि प्रचंड हो उठती है। चुनौतियाँ असंख्य हैं, पर अवसर भी अनंत हैं। हमारा दुःख भारी है, लेकिन हमारी करुणा उतनी ही सशक्त और सुकून देने वाली है। हम एक ब्रह्मांडीय जाल में बहते हैं — विस्मय और भय, आश्चर्य और संदेह, सृजन और परिवर्तन के बीच... हमारे और सभी के।
यह अथाह और निरंतर बुनाई प्रेम ही है — अपने सभी रूपों में।
हम अपनी माता पृथ्वी की गुनगुनाहट, उसकी पुकार, उसकी धड़कन और उसके दुखों को सुनते हैं। हम स्वयं भी मिट्टी से बने हैं — और इसीलिए संवेदनशील हैं। जब हम प्रेम को जीते हैं, तो वह बहता है — निरंतर — और निराशा, असहायता व एकांत की फटी मिट्टी को सींच देता है।
साँस अंदर लेते हुए, हम लौट आते हैं — पूर्ण कृतज्ञता के विस्तार में।
साँस छोड़ते हुए, हम जुड़ते हैं — और करुणा और देखभाल को प्रकट करते हैं।
प्रेम ही है जो दुःख को अर्थ देता है, क्रोध को कर्म में बदलता है, निराशा को रूपांतरण में और भय को सुरक्षा में परिवर्तित करता है। प्रेम से ही सभी घाव भरते हैं, सुधरते हैं, पुनः बनते हैं... और पुल खुलते हैं।
क्योंकि हमारा अस्तित्व — पूर्णतः — खुल जाता है।और विश्वास जन्म लेता है।

प्रिय संबंधियों, उन शुरुआती कदमों को याद करो — जब हम अज्ञानता और खोज में साथ चलते थे!हाँ।
वे शुरुआती कदम हम फिर से चलते हैं — यहीं, अभी।
आज, हम अपने कदम सजगता और संकल्प के साथ रखते हैं। हमारा अतीत हमें सजग बनाता है, और हमारा कल — अभी, इसी क्षण — हमारे भीतर बन रहा है। हाँ।
उस समय को दिल में लाओ जब हम नंगे पैर चलते थे। जब हमारे पैरों ने धरती की त्वचा को छुआ था, काँटों और कंकड़ों की परवाह किए बिना, सिर्फ़ खेलने और जुड़ने की चाह में।

प्रिय जनों, अपनी धरती मां के उस कोमल आलिंगन को याद करो — उसकी स्नेहमयी दृष्टि और मुस्कुराहट को।
हम भी मुस्कुराते हैं, क्योंकि हम सच में सुन रहे हैं।

अब, हम भी लहराते हैं। हम गुनगुनाते हैं, धड़कते हैं, कांपते हैं। हम भी आसमान के नीचे सांस लेते हैं और बुदबुदाते हैं।

चिंतन के लिए मूल प्रश्न:

1- आप इस विचार से कैसे जुड़ते हैं कि प्रेम, अपने अनेक रूपों में, विस्मय और भय — दोनों के बीच से गुजरता हुआ — हमें जीवन में अर्थ और परिवर्तन की ओर ले जाता है?
2- क्या आप कोई व्यक्तिगत कहानी साझा कर सकते हैं जब आपने प्रकृति से गहरा संबंध महसूस किया था — शायद नंगे पैर चलते समय — और उसने आपके दृष्टिकोण या भावनाओं को कैसे बदला?
3- ऐसा क्या है जो आपको अपने दैनिक कार्यों में सजग और उद्देश्यपूर्ण बनाए रखता है — जैसा कि इस लेख में सुझाया गया है — ताकि आप कृतज्ञता और जुड़ाव की आदत विकसित कर सकें और आने वाले कल का सार आज में ला सकें?
 

Excerpted the preface of A Future We Can Love.


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