The False Duality Between "Job" And "Service"

Author
Zilong Wang
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Image of the Week" काम " और " सेवा " के बीच का मिथ्या द्वन्द
ज़िलोंग वांग

जुलाई में मेरे एशिया जाने के समय, मेरे दो प्रिय मित्रों/शिक्षकों ने पूर्णकालिक सेवा छोड़कर पूर्णकालिक नौकरी ले ली। उनके व्यवस्था (सिस्टम) में वापस लौटने के निर्णय ने मुझे पूरी तरह से झकझोर दिया, और मुझे काम और सेवा के बारे में मेरी मान्यताओं पर पुर्नविचार करने को मजबूर किया।

तब तक मुझे ये पता भी नहीं था के मैं सेवा के प्रति ये विचार बिना सोचे माने बैठा हूँ के: " पूरी तरह से सेवा करने के लिए व्यक्ति को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है "; बदलाव लाने के लिए व्यक्ति को मुख्य धारा से अलग होना पड़ता है "; " व्यक्ति मुख्य धारा के जितना विरुद्ध और जितना दूर उतना अच्छा।" मैंने अपने मन में " नौकरी करने " और " सेवा के लिए जीने " के बीच एक अनावश्यक द्वन्द बना लिया था।

शायद कुछ कट्टर कार्यकर्ताओं के साथ रहने के कारण मैं एक प्रकार के " सेवा कट्टरवाद " का शिकार हो गया था : सेवा में सच्ची प्रगति करने के लिए मुझे अपनी नौकरी, अपना वीसा, पासपोर्ट, धन और संपत्ति का त्याग करना पड़ेगा, एक गरीब और हिंसक जगह पर रहना होगा, एक कठोर स्थानीय जैविक शाकाहारी बनना होगा -- और शायद दाढ़ी भी उगानी पड़े; इससे कुछ भी कम बिलकुल बेमाईने होगा।

मेरी मान्यताओं में सन्निहित सूक्ष्म अहंकार और " विशुद्धतावाद " पे मेरा ध्यान ही नहीं गया; ना ही मैं " सेवा को ऐसा होना चाहिए " का एकाधिकार पाने में छिपी हुई हिंसा को देखा पाया।

मेरी यात्रा के पिछले नौ महीनो में, मैं जहाँ भी गया लगभग हर जगह गृहस्थों ने मेरी सांसारिक जरूरतों को पूरी करने में मेरी मदद की। मैं कौन होता हूँ ये कहने वाला के मेरा रास्ता ज़्यादा गुणी और शुद्ध है ? क्या मैं अपनी " अनासक्ति " को सम्मान के बिल्ले की तरह पहन कर अपना " गंदा काम " दूसरों से करवा रहा हूँ ?

" धरती पर घुटने टेकने और उसे चूमने के हज़ार तरीकों " को देखने के बाद मुझे निम्नलिखित बातें स्पष्ट हो गयी हैं।

एक, जब तक हम समाज से पूरी तरह निकल नहीं जाते तब तक मुख्य धारा से सारे सम्बन्ध काटना असंभव है। किसी व्यक्ति की नैतिकता को उसके मुख्य धारा से अलगाव से नापना केवल पाखण्ड या ढोंग ही होगा।

दो, व्यवस्था ( सिस्टम ) में रहते हुए सेवा करने के लिए ज़्यादा नम्रता और कुशलता की आवश्यकता है। नम्रता इसलिए क्यूंकि हम तुरंत किसी नैतिक विजय का दवा नहीं कर सकते, नहीं तपस्या से मिलने वाला सूक्ष्म प्रतिज्ञान ( subtle affirmation ) प्राप्त होता है। कुशलता इसलिए के व्यक्ति को विरोधाद्भासों के बीच खड़ा रहना पड़ता है, अलग-अलग विचारों को सुन्ना पड़ता है, व्यवहारिक साधन विकसित करने पड़ते हैं, कोने और छेद ढूंढने पड़ते हैं जहाँ बदलाव के बीज डाले जा सकें।

मैं यह सोचकर आत्म चापलूसी करता था, के मैंने नौकरी इसलिए छोड़ दी क्यूंकि उद्योग समस्या के मूल कारण पे काम ही नहीं कर रहा था -- " मैं कितना नीतिवान ! ", अहंकार ने कहा। पर अब मुझे अहसास हो रहा है के मै जहाँ था वहां से सेवा नहीं कर पाया। अगर एक कसाई बैलों की लालसा करते हुए धर्म के मार्ग पर चल सकता है तो सुन्दर कार्यालयों में बैठे हम लोगों से धर्म विकास की अपेक्षा तो की जा सकती है :)

तीन, " दोनों दुनिया में पैर होने " के बहुत फायदें हैं। पारंपरिक काम ( सार्वजनिक / निजी / गैर सरकारी संगठनो में किया गया भुगतान वाला कार्य ) हमें ज़मीनी वास्तकविता से जोड़े रखता है और " दक्षता उपकरण " ( " efficiency tools ") विक्सित करने में मदद करता है। सेवा का काम हमें जीवन का अंतिम उद्देश्य याद दिलाता है और " मन के साधन " ( " heart tools ") विक्सित करने में मदद करता है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

अंततः हम जहाँ हैं वहां से सेवा करना ही साधना है। सेवा का एक स्वरुप दूसरे स्वरुप से किसी भी तरह और बेहतर या पवित्र नहीं है। हम सभी इस भव्य योजना में एक विशेष कारण से हैं।

चिंतन के लिए बीज प्रश्न :
आप " सेवा कट्टरवाद " को कैसे समझते हैं ?
क्या आप अपना निजी अनुभव बाँट सकते हैं जब आप को एक ऐसे काम में पवित्रता का अनुभव हुआ जो पहले आपको ठीक नहीं लगता था ?
" सेवा कट्टरवाद " के चंगुल से बचने में आप को क्या मदद करता है?

यह लेख ज़िलोंग वांग के ब्लॉग पोस्ट से उद्धृत है।
 

Excerpted from Zilong Wang's blog post.


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