Planetary Beings with Planetary Hearts

Author
Clare Dakin
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Image of the Weekसांसारिक मन वाले सांसारिक प्राणी
-- क्लेयर डेकिन (७ जून, २०१६)

आदी हो जाने और सुरक्षित महसूस करने की प्रवृत्ति ज़्यादा शक्तिशाली लगती है - यथास्थिति बनाए रखने के लिए - जितने आराम से और बचकर हम रह सकते है रहें, साथ ही पागलों की तरह यह दुआ मांगते हुए कि कोई और कदम आगे बढ़ाएगा और ये सारी मुसीबत को दूर भगा देगा।

मैं इस पल में यह फिर से परिभाषित करने जा रही हूँ। मैं कहने जा रही हूँ कि हमारा सहज जीवन उस मूलतत्त्व का भाग है जो प्रकृति के ताने-बाने में बुना है - हमारी सांसारिक आत्मा - वो भाग जो हर जीव के शुद्ध जीवंतता और ज्ञान के सार से कम्पित हो रहा है - वो भाग जो उस बह्मांड से जो हमारे साथ जीता है और सांस लेता है, उससे न कभी अलग हुआ है और न कभी हो सकता है।

मेरे अंदर है, यह तरल आग की तरह महसूस होता है। यह इस शब्द, आवश्यक, का सार ही है। [...]

क्या आप इसे महसूस कर सकते हैं? मैं इसे इतनी प्रचंडता से महसूस करती हूँ कि मैं इसे बहुत मुश्किल से झेल पाती हूँ, और मुझे नहीं लगता कि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प है कि मैं इसे अपने पर हावी होने दूँ, और परिणाम जो भी हो, उसकी कोई परवाह नहीं। मैं आखिर चाहती भी क्या हूँ? इस तरह ज़रूरत से ज़्यादा अनुकूलित रहने वाली एक औरत को रोकने केलिए, जिसका डरता हुआ प्रारूप पूरी तरह से जीने से पीछे हटता है या प्रकृति को अपने को सर से पाँव तक या अंदर से बाहर तक फिर से शिक्षित करने के लिए कि पूरी तरह से, धड़कते हुए, प्रतिक्रिया देते हुए, चमकते हुए जीने का क्या अर्थ है?
मैं बाद वाले का चयन करती हूँ - हालांकि यह काफ़ी कुछ मरने जैसा लगता है क्योंकि जो मैं नहीं हूँ, वो जल के भस्म हो जाता है और जो अधिक आंतरिक है और जिसे कम ही लोग जानते है, वो उभर आता है। मैं हाँ कहती हूँ और मैं चाहती हूँ कि हम सब हाँ कहें, क्योंकि जो हम औरत होने के नाते में असल में हैं, उसकी ज़रूरत है। असंगत और सुरक्षित होने का नाटक बहुत हो गया - इसने हमें जहां हम अब हैं वहां तक पहुंचने की अनुमति दी है और जहां हम हैं, वह जीवन को अपांग बना रहा है - वह - और हम - इस तरह - नहीं - चलते रह सकते।

उस तरल आग को सामने लाने और अपने आप को उस जीवंतता, जो विकासवादी ज्ञान से छिपी हुई है, से भिगो देने के और भी होशपूर्वक तरीके हैं। प्रकृति का ज्ञान हर क्षण हमारे जीवन में स्पंदन करता रहा है, लेकिन हमारी आँखे उस की और बंद रही हैं, उससे छिटकी हुए, इस बात से गुमराह कि हम कैसे सोचते हैं और अपना ध्यान और मूल्य किस चीज़ पर लगाते हैं।
अगर हम सामूहिक रूप से इसे सामने लाते हैं तो क्या होगा? अगर हम चढ़ती लहर की ओर घूम जाएँ और सिर्फ उसे बीएस हाँ न कह दें, लेकिन उसे हमें पूरी तरह ढक लेने और हमें शक्तिशाली रूप से फिर सीखने की इजाज़त दे दें ताकि हम आखिर जान पाएं कि हम क्या हैं और हम किस लिए हैं?

सांसारिक प्राणी, अपने ब्रह्माण्ड के आकार के दिल के साथ, एक ऐसे सम्पूर्ण ब्रह्मण्डिक प्यार की क्षमता रखते हैं कि हम एक पूरी पारिस्थितिक बहाली को अपनी बपौती छोड़ने के अलावा अन्य किसी भी चीज़ को हमारी विरासत होने की अनुमति नहीं दे सकते। यही मेरी इंसान की नई परिभाषा है, जानो कि मैं क्या बनता जा रहा हूँ - और अगर मैं ऐसा बन रहा हूँ, तो तुम भी वैसे बन रहे हो।


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