Man's Most Important Mistake

Author
G. I. Gurdjieff
69 words, 16K views, 11 comments

Image of the Weekमनुष्य की सबसे बड़ी गलती

-- जी आई गुरजिफ (१ जुलाई, २०१५)

आदमी की सबसे बड़ी गलतियों में से एक ऐसी है, जिसे हमें याद रखना चाहिए, वो है उसका अपने “मैं” के बारे में भ्रम।

जिस इंसान को हम जानते हैं, यह “मशीनी इंसान,” जो कुछ “कर” नहीं सकता और जिसके साथ और जिसके माध्यम से सब कुछ “हो जाता” है, उसका एक स्थायी और कोई एक “मै” नहीं हो सकता। उसका “मै” उतनी ही तेज़ी से बदलता है जितनी तेज़ी से उसके विचार, भावनाएं और मन, और वह खुद को हमेशा एक ही इंसान समझकर बहुत बड़ी गलती करता है; असल में वह हमेशा बदलता रहता है, वैसा नहीं रहता जैसा वह एक पल पहले था।

मनुष्य का कोई स्थायी और अपरिवर्तनीय “मैं” नहीं है। हर विचार, हर मूड, हर इच्छा, हर संवेदना, 'मैं' कहते हैं। और हर स्थिति में उसे ऐसा समझा जाता है कि यह “मैं” सम्पूर्ण का, पूरे इंसान का भाग है, कि एक विचार, इच्छा, या एक घृणा इस सम्पूर्णता द्वारा व्यक्त होती है। वास्तव में इस धारणा की बिलकुल कोई बुनियाद नहीं है। मनुष्य का हर विचार और इच्छा अलग-अलग और सम्पूर्ण के बिना उभरता और जीता हैं। और क्योंकि उस सम्पूर्ण का अपने आप में एक अस्तित्व है, इसलिए वह कभी अपने आप को केवल स्थूल रूप में किसी चीज़ की तरह, और निराकार रूप में एक अवधारणा के रूप में प्रकट नहीं होने देता।

मनुष्य का कोई एक “मैं” नहीं है। लेकिन, उसकी बजाए, उसके सैंकड़ों और हज़ारों अलग-अलग छोटे-छोटे “मैं” होते हैं, ज़्यादातर जिनको एक-दूसरे की खबर नहीं होती, जो कभी एक-दूसरे के संपर्क में नहीं आते, या, बल्कि, एक-दूसरे के प्रतिकूल, परस्पर अनन्य और असंगत होते हैं। हर मिनट, हर पल, आदमी “मैं” कह या सोच रहा है। और हर बार उसका “मैं” अलग है। अभी- अभी वह एक विचार था, अब वह एक इच्छा है, अब एक अनुभूति, अब एक और विचार, और ऐसे निरंतर चलता रहता है। मनुष्य में बहुलता है। मनुष्य का नाम ही असंख्य है।

यह समझने की कोशिश करो कि जिसे आप आम-तौर पर ”मैं” कहते हैं, वह मैं नहीं है; बहुत से “मैं” हैं और हर-एक “मैं” की एक अलग इच्छा है। इसको जांच कर देखो। आप बदलना चाहते हो, लेकिन आपके किस भाग की यह इच्छा है? आपके बहुत से भाग बहुत-सी चीज़ें चाहते हैं, लेकिन सिर्फ एक भाग असली है। इसी में फायदा है कि आप खुद के साथ ईमानदरी का बर्ताव करो। यह ईमानदारी ही वह चाबी है जो उन द्वारों को खोल देगी, जो आपको अपने अलग-अलग भागों को देख पाने में मदद करेंगे, और आप कुछ एकदम नया देखोगे। आपको ईमानदार बनने की कोशिश करते रहना चाहिए। प्रत्येक दिन आप कोई मुखौटा पहन लेते हैं, और आपको उसे थोड़ा-थोड़ा करके उतारना होगा।

विचार के लिए कुछ मूल प्रश्न: आप इस धारणा से क्या समझते हैं कि आपके अंदर कई "मैं" हैं, हर "मैं" एक अलग इच्छा रखता है? क्या आप अपना कोई व्यक्तिगत अनुभव बाँटना चाहेंगे जहाँ आपको और सब “मैं” के बीच असल “मैं” का अहसास हुआ हो? ऐसा कौनसा परीक्षण है जो आपको यह जानने में मदद करता है कि आपने असली “मैं” को छू लिया है?

जार्ज इवानोविच गुरजिफ 20 वीं सदी के शुरू से बीच तक के एक प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे।
 

Georges Ivanovich Gurdjieff â€‹was an influential spiritual eacher of the early to mid-20th century.


Add Your Reflection

11 Past Reflections