यह लेख मेरे दिल को छू गया। पहले मैं सोचता था कि अध्यात्म का रास्ता खुद को मिटाने का है, लेकिन अब समझ आता है कि खुद को पूरी तरह अपनाना ही असली अध्यात्म है।
जब मैंने अपने भीतर के विरोधों – जैसे कि कभी शांत तो कभी क्रोधित, कभी आत्मविश्वासी तो कभी डरपोक – को स्वीकार करना शुरू किया, तब मेरे भीतर की गहराई खुलने लगी। मैं अब सिर्फ 'कुछ' नहीं हूँ — मैं सब कुछ हूँ। मैं माँ भी हूँ, साधक भी, प्रेम में पिघला इंसान भी और कभी-कभी उलझा कलाकार भी। और इन सभी रूपों को 'हाँ' कहने से ही मेरे जीवन में शांति आई है।
अब मैं रोज़ सुबह खुद से यही कहता हूँ —
"मैं जैसा हूँ, वैसा ही पूर्ण हूँ। मैं खुद को प्रेम करता हूँ।"
On Jun 4, 2025 prakash patel wrote :