
एक आशावादी संदेही
— जमील ज़ाकी
एक प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार, आशा एक अभिशाप के हिस्से के रूप में पृथ्वी पर आई थी। प्रोमेथियस ने देवताओं से आग चुराई थी, और ज़्यूस ने इस चोरी का बदला एक "उपहार" के माध्यम से लिया। उसने हेफेस्टस को पहली महिला, पेंडोरा, के निर्माण का आदेश दिया और उसे प्रोमेथियस के भाई को भेंट कर दिया। पेंडोरा को बदले में एक मिट्टी का जार दिया गया था—जिसे ज़्यूस ने उसे कभी न खोलने के लिए कहा था। जिज्ञासा उस पर हावी हो गई, उसने ढक्कन उठाया, और दुनिया की तमाम बुराइयां बाहर निकल आईं: हमारे शरीर के लिए बीमारी और भुखमरी, हमारे दिमाग के लिए द्वेष और ईर्ष्या, हमारे शहरों के लिए युद्ध। अपनी गलती का एहसास होने पर, पेंडोरा ने जार को जोर से बंद कर दिया, जिससे केवल 'आशा' अंदर फंसी रह गई। पर सवाल यह है—
आशा दुखों के साथ वहाँ थी ही क्यों?
कुछ लोग मानते हैं कि आशा ही उस पात्र की एकमात्र भली चीज़ थी,
और उसका बंद हो जाना हमारे लिए और भी दुर्भाग्यपूर्ण रहा।
कुछ कहते हैं कि आशा भी बाकी अभिशापों जैसी ही है।दार्शनिक नीत्शे ने यहाँ तक कहा किआशा सबसे खतरनाक बुराई है,क्योंकि वह मनुष्य के दुख को लंबा खींचती है।
शायद आपको भी कभी ऐसा लगा हो।
अक्सर आशा को भ्रम या ज़हर जैसा बताया गया है—कि वह हमें असल समस्याओं से आँख चुराने पर मजबूर करती है।लेकिन विज्ञान आशा को अलग तरह से देखता है।
मनोवैज्ञानिक रिचर्ड लाज़रस कहते हैं—आशा का अर्थ है यह मानना
कि जो अच्छा अभी हमारे जीवन में नहीं है,वह फिर भी संभव हो सकता है।
यानि आशा समस्याओं से भागना नहीं,बल्कि उनका सामना करने की एक प्रतिक्रिया है।आशावाद कहता है—“सब ठीक हो जाएगा।”आशा कहती है—“सब ठीक हो सकता है।”
आशावाद थोड़ा आदर्शवादी है।आशा ज़्यादा व्यावहारिक है।वह हमें एक बेहतर दुनिया की झलक दिखाती है और उसके लिए कदम उठाने की ताक़त देती है।
आशा कोई खास लोगों की चीज़ नहीं—
हम में से हर कोई इसका अभ्यास कर सकता है।
मेरे मित्र एमिल ने यही किया।उन्होंने वही दुनिया देखी जो हम देखते हैं,
पर नकारात्मक सोच में सिमटने के बजायउन्होंने शांति के लिए काम करना चुना,
समुदाय बनाए,और अपने मूल्यों को जिया।
एमिल की सकारात्मकता कई बार अलौकिक सी लगती थी।उनका स्वभाव, अनुभव और इच्छाशक्ति—तीनों का ऐसा मेल था जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।वे शांति को ऐसे देखते थे जैसे डॉक्टर इलाज को देखते हैं।जैसे बीमारी शरीर की गड़बड़ी है,
वैसे ही वे हिंसा और क्रूरता को समाज की बीमारी मानते थे।वे नफ़रत के कारणों को समझते,और करुणा बढ़ाने के रास्ते खोजते।
नकारात्मक सोच से बाहर आने का उनका एक बड़ा साधन था—संदेहवाद।
यानी बिना प्रमाण हर बात को सच न मान लेना।अक्सर नकारात्मक सोच और संदेहवाद को एक-सा समझ लिया जाता है,पर दोनों बिल्कुल अलग हैं।
नकारात्मक सोच = लोगों और दुनिया को लेकर पहले से बनी हुई कठोर धारणाएँ।
संदेहवाद = अपनी ही धारणाओं पर सवाल करने की तैयारी।नकारात्मक सोच मान लेती है कि इंसान बुरा है।संदेहवाद ध्यान से देखता है—कि कहाँ, किस पर, कितना भरोसा किया जा सकता है।एमिल ऐसे ही आशावादी संदेही थे—मानवता से प्रेम भी,और जिज्ञासु, साफ़ नज़र भी।
आज हमारी संस्कृतिbलालच, नफ़रत और बेईमानी पर इतनी टिक गई है
कि हम इंसानों की अच्छाई को लगातार कम आँकते जा रहे हैं।अध्ययन बताते हैं—
ज़्यादातर लोग यह नहीं समझ पाते कि सामने वाला असल में कितना उदार, भरोसेमंद और खुले मन का हो सकता है।औसत इंसान दूसरे औसत इंसान को कम आँकता है।
इसमें एक अच्छी खबर छिपी है—लोग शायद आपकी सोच से बेहतर हैं।
अगर हम जल्दी निष्कर्ष निकालने के बजाय थोड़ा ठहरकर, ध्यान से देखें—तो हर जगह सुखद आश्चर्य मिल सकते हैं।आशा कोई भोली सोच नहीं है।यह उपलब्ध सबसे अच्छे प्रमाणों पर आधारित एक सटीक प्रतिक्रिया है।यह ऐसी आशा है
जिसे नकारात्मक सोच से थके लोग भी अपना सकते हैं—और उन मानसिक जालों से बाहर आ सकते हैं जिनमें हम फँसते चले जाते हैं।अक्सर नकारात्मक सोच
अधूरी जानकारी का नतीजा होती है।कम नकारात्मक होना बस इतना है—थोड़ा और साफ़ देखना।
हम उस दुनिया की ओर बढ़ सकते हैं
जो हम सच में चाहते हैं—अगर हम दूसरों में अच्छाई देखने का साहस रखें।नकारात्मक सोच एक धुंधला चश्मा है जो हम अनजाने में पहन लेते हैं।पर अच्छी बात यह है—हम उसे उतार सकते हैं।और शायद…जो दिखे, वह हमें चकित कर दे।
मनन के लिए मूल प्रश्न -
आप इस विचार से कैसे जुड़ते हैं कि संदेहवाद हमारी मान्यताओं की पकड़ को हल्का करके और हमें जल्दी सीखने में मदद करके नकारात्मक सोच से लड़ सकता है? क्या आप अपने जीवन की कोई ऐसी घटना साझा कर सकते हैं जब आपने अपनी धारणाओं पर संदेह करना चुना, और उसके परिणामस्वरूप दूसरों के बारे में कुछ अप्रत्याशित रूप से सकारात्मक जाना?आपको नकारात्मक सोच के “धुंधले चश्मे” उतारने में और दूसरों में अच्छाई देखने में क्या मदद करता है?