Where The Ganges Murmur On A Sunny Day


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जहाँ धूप में गंगा धीरे-धीरे गुनगुनाती है
— ओम् स्वामी के द्वारा

क्या आपने कभी दो या चार हफ्तों की छुट्टी के बाद, अपने घर का मुख्य दरवाज़ा खोला है? भीतर कदम रखते ही बंद घर की हल्की-सी सुगंध, धूल की मीठी महक आपका स्वागत करती है। आप सोफ़े पर ढह जाते हैं, एक लंबी साँस छोड़ते हैं और कहते हैं— “घर… अपना घर।”

कितनी भी सुंदर यात्रा क्यों न हो, कुछ समय बाद मन घर को याद करने लगता है। हम अपने जाने-पहचाने माहौल में लौटना चाहते हैं। घर शायद जितना सादा हो— वहाँ न रूम सर्विस है, न चमक-दमक— फिर भी वही सबसे आरामदायक लगता है। एक सहजता, अपनापन, और अलग तरह की आज़ादी महसूस होती है। यह सब पाँच-सितारा सुविधाओं से भी ऊपर होता है।

हमारी आत्मा के साथ भी यही होता है। यह शरीर उसका स्थायी घर नहीं है। हमारी व्यक्तिगत चेतना, अनादि-अनंत चेतना से मिल जाने का आग्रह रखती है। वह अपने घर लौटना चाहती है। वह शायद शब्दों में साफ न कह सके, पर उसका यही स्वभाव है। हम अपार सम्भावनाओं और मुक्त अस्तित्व वाले प्राणी हैं— और यहाँ मन-शरीर की छोटी-छोटी इच्छाओं से बँधे पड़े हैं।

आत्मा अपने स्त्रोत की ओर लौटना चाहती है। यही सृष्टि, जन्म-मरण और प्रकृति का मूल नियम है: हर चीज़ अपने मूल में लौटती है। शरीर अस्थायी है, मन संस्कारों से बंधा, चेतना मार्ग खोजती राहगीर— पर आत्मा जानती है कि उसे किस ओर जाना है।

इसीलिए हर इंसान जीवन में कभी-न-कभी अपने अस्तित्व के अर्थ पर रुककर सोचता है। जिसने भी तृप्ति का एक क्षण भी चखा है, वह अपने व्यक्तिगत जीवन से बड़ी यात्रा पर निकल पड़ता है। यह यात्रा आइंस्टाइन की खोजों से शुरू हो सकती है या मसीह की करुणा से; बुद्ध के शांति-पथ से या वेदों के मोक्ष से।

हम भले ही अपनी असली प्रकृति को भूल गए हों, लेकिन आत्मा— जो शाश्वत, निर्मल और अनंत है— घर लौटना चाहती है। जब तक हम उसे राह नहीं दिखाते, भीतर की बेचैनी खत्म नहीं होती। कोई सुख, कोई रिश्ता स्थायी तृप्ति नहीं दे सकता— क्योंकि हम सब इस जीवन में मानो छुट्टी पर आए हुए यात्री हैं… और हमें अपना घर याद आता रहता है।

ध्यान, घर लौटना है।
ध्यान वह वापसी है अपने उस स्त्रोत पर— जहाँ हम सच में हैं। जहाँ हम न वो हैं जो लोग हमें समझते हैं, न वो जो दुनिया ने हमें मानने पर मजबूर किया, और न ही वो जो हम खुद अपने बारे में सोचते हैं। ध्यान है अपने को देखना, अपने उस मूल स्रोत तक पहुँचना— जहाँ से आनंद, खुशी और शांति निरंतर बहती है।

वह है अपने असली घर की खोज— जहाँ न ईर्ष्या, न लालच, न तुलना, न द्वेष। जहाँ अहंकार की दीवारें नहीं, क्रोध के दरवाज़े नहीं।

एक ऐसा स्थान, जहाँ आत्मा शांति में विश्राम करती है… जहाँ चेतना बिना रोके बहती है— जैसे धूप में शांत, धीमे स्वर में गुनगुनाती हुई गंगा।



मनन के लिए मूल प्रश्न
1-आप इस विचार को कैसे देखते हैं कि हमारी आत्मा एक थका हुआ यात्री है, जो अपने असली घर लौटने को बेचैन है?

2- क्या आप कोई ऐसा अनुभव बाँटना चाहेंगे जब आपको किसी स्थान, किसी अवस्था, किसी मौन क्षण की तीव्र याद आई हो— जहाँ आपको सच-मुच “घर” जैसा लगा हो?

3-ध्यान, मौन, या आत्म-चिंतन की वह कौन-सी साधनाएँ हैं जो आपको अपने भीतर के घर से फिर जोड़ देती हैं?
 

Om Swami is a Himalayan mystic. Excerpt above from his book, A Million Thoughts.


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